15. अस्पृश्यों का ईसाईकरण - Page 368

अस्पृश्यों का ईसाईकरण

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इसमें संभवतः उस धर्माध्यक्षीय दावे से कुछ अधिक दीख पड़ता है, जिसे एस्थर की पुस्तक के अनुसार सदा ही फारस के साम्राज्य का प्रांत माना जाता रहा।

तीसरी सदी के प्रारंभ मे पांचवीं सदी के अंत तक घटनास्थल अलेक्जांड्रिया से हटकर एंटियोक हो जाता है। ईसाई उद्यम का भार एंटियोक ने अपने कंधों पर ले लिया।

छठी सदी ईसाई धर्म के प्रसार के लिए अंतिम शांतिपूर्ण काल रही। लगता है कि वहां एक युग का अंत हो गया। उसके बाद सारसेनों (अरबों) का उत्थान हुआ। वे मुहम्मद के कुरान और तलवार को समूचे पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका तक ले गए। फिर उन्होंने स्वयं यूरोप को वियना तक और स्पेन से फ्रांस के मध्य तक आतंकित कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सभी ईसाई दिशाहीन हो गए और उनका धर्म-प्रचार अनेक सदियो तक रुका रहा।

वर्ष 1497 में वास्कोडिगामा ने भारत की यात्रा की। उससे भारत में ईसाई धर्म-प्रचार के इतिहास का एक नया युग प्रारंभ होता है। वर्ष 1542 में महान मिशनरी फ्रांसिस जेवियर के आगमन से भारत में सर्वाधिक गंभीर तथा सुदृढ़ मिशनरी प्रयास प्रारंभ हुआ। पुर्तगाल वह पहली यूरोपीय शक्ति थी, जिसने पूर्वी भारत में अपने पैर जमाए। उसके शासक-काल में भारत के मूल निवासियों के ईसाइकरण के सर्वप्रथम प्रयास किए गए। पुर्तगालियों के शासन-काल में जो धर्म-परिवर्तन किए गए, निश्चय ही वे रोमन कैथोलिक मत में किए गए। उन्हें रोमन कैथोलिक मिशनों ने किया।

लेकिन अधिक देर तक वे बिना होड़ के नहीं रहे। जल्दी ही होड़ के मैदान में प्रोटेस्टैंट आ गए। सर्वप्रथम प्रोटेस्टैंट प्रचार लुथेरनों का था। उन्होंने डेन्मार्क के राजा के संरक्षण में 1706 में ट्रेक्वेबार में अपने पैर जमाए। योग्य तथा समर्पित श्वार्ट्ज ने त्रिचनापल्ली तथा तंजोर में 18वीं सदी के उत्तरार्ध में अथक परिश्रम किया। वह इस मिशन के सदस्य थे। उसके बाद इस मिशन का अधिकांश भार ‘बाइबिल’ प्रचार समिति द्वारा ले लिया गया।

उसके बाद कैरी के नेतृत्व में बैपटिस्ट मिशन 1793 में कलकत्ता में आया। अंत में एंग्लिकन चर्च आया। वह मिशनरी क्षेत्र में 1813 में कूदा। उसके बाद मिशनरी का उद्यम का विस्तार लगातार तेजी से हुआ।

अतः भारत में ईसाई प्रचार को लंबी दौड़ दौड़नी पड़ी है। सारसेनों के उत्थान से पूर्व वह चार सदियों तक प्रयास करता रहा। सारसेनों ने मिशन के कार्य पर