15. अस्पृश्यों का ईसाईकरण - Page 369

354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विराम लगा दिया। सारसेनों के पतन के बाद उसे पुनः लगभग चार सदियों का समय मिला है। 60 लाख संख्या की यह कुल कमाई आठ सदियों की है। जाहिर है कि यह बड़ी निराशाजनक कमाई है। इसने सेंट जेवियर को निराश किया। इसने एब्बै डुबोइस को भी निराश किया। जेवियर के कोई तीन सौ साल बाद 1823 में उन्होंने लिखा कि हिंदुओं को ईसाई बनाने की आशा छोड़ देनी चाहिए। तब अधिक आशावादी ईसाई मिशनरियों ने उनकी आलोचना की थी। लेकिन तथ्य यह है कि इस अवधि की समाप्ति पर कोई 35 करोड़ 80 लाख की कुल आबादी में ईसाई 60 लाख के लगभग हैं। यह अति मंद विकास है। प्रश्न यह है कि इस मंद विकास के कारण क्या हैं।

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मुझे लगता है कि ईसाई धर्म के विकास में अवरोध के तीन कारण रहे हैं। पहला कारण तो यह है कि शुरू-शुरू में भारत में आकर बसने वाले यूरापीयों का, विशेषतः उन अंग्रेजों का नैतिक आचरण अच्छा नहीं रहा, जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत भेजा था। भारत भेजे गए लोगों तथा कंपनी के सेवकों के चरित्र के बारे में कंपनी के पक्षधर श्री काये ने अपनी कृति ‘क्रिश्चियनिटी इन इंडिया’ में इस प्रकार लिखा हैः

निश्चय ही उनमें मध्य वर्ग के कुछ ईमानदार, शालीन लोग थे... लेकिन

लगता है कि समयकालीन लेखकों के अनुसार अनेक समाज के लिए समस्या थे,

वे नौजवान थे, संभवतः भले घरों के थे, पर उनके लिए कलंक थे। अतः उन्हें

इस आशा से अपने से अलग किया जाना था कि ये फिजूलखर्च विलासी युवक

‘विशाल भारत’ से कभी स्वदेश नहीं लौटेंगे। यह आशा नहीं की जा सकती

कि जिन लोगों ने स्वयं को स्वदेश में कलंकित किया था, वे विदेश में अधिक

सम्मानजनक जीवन व्यतीत करेंगे।

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सच तो यह है कि नैतिक आचरण या भद्र आचरण को कायम रखने के

लिए कोई संस्कार उनमें थे ही नहीं। अतः भारत के समुद्र तट पर उतरते ही

उन्होंने अपनी उन सभी नैतिक बंधनों को तोड़कर फेंक दिया, जिनका अंकुश

उन पर उनके देश के गांवों में लगा हुआ था। उन्होंने स्वयं को विशेषाधिकारों

वाला व्यक्ति माना। उनका विचार था कि उन्हें विशेषाधिकार है कि वे धर्म

और नैतिकता के सभी दायित्वों का उल्लंघन कर सकते हैं और जीवन की