15. अस्पृश्यों का ईसाईकरण - Page 370

अस्पृश्यों का ईसाईकरण

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सभी भद्रताओं का अतिक्रमण कर सकते हैं। स्वदेश छोड़कर जाने वाले ये लोग प्रायः परले-सिरे के दुस्साहसी एवं तिकड़मी थे। धर्मशास्त्र को कठोर भाषा में कहा जाए तो उन्हें इंग्लैंड के खरपतवार की भांति फेंक दिया था। उनकी कामना थी कि वे अपने फूटे भाग्य को संवारने के लिए पूर्व की स्वर्णिम ध रती पर पैर रखें, अपने कलंकित नाम को सदा के लिए वहां दफना दें और अराजकता का सहारा लेकर कमजोर तथा सहज विश्वासी लोगों से वह धन छीन लें, जिस स्वदेश में परिश्रम द्वारा प्राप्त करने में वे स्वभावतः असमर्थ थे। उन्होंने धोखाधड़ी की, उन्होंने जुआ खेला, उन्होंने जी भरकर शराब पी, उन्होने

खुलकर सभी प्रकार का व्यभिचार और व्यसन किया। वे एक-दूसरे से व्यसन और लोभ से जुड़े थे, पर फिर भी प्रायः वे एक-दूसरे से घोर विद्वेष करते थे। भले ही वे चंद लोग थे, पर उनके बीच कोई भाईचारा नहीं था, था तो केवल जुर्म करने का भाईचारा।

यह सब नवागंतुक के पक्ष में नहीं था। अतः जहां तक भ्रष्ट को सुधरने का कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता था, वहां विशुद्ध आचरण वाला भी शायद ही भ्रष्टाचार से बच पाता था। चाहे उन्हें वहां विनाशकारी भूल के लिए दीक्षा दी गई हो या सिद्धहस्त बनाया गया हो, उन्हें समान रूप से परिस्थितियों का दास कहा जा सकता है।....

प्रारंभिक ईसाइयों का नैतिक आचार-व्यवहार कितना भ्रष्ट था, उसका अनुमान श्री काये द्वारा उद्धृत निम्न घटनाओं से लगाया जा सकता हैः

बंबई के डिप्टी-गनर्वर पर 1669 में ये आरोप लगाए गए थेः

उसने विश्राम दिवस (रविवार) को नियत समय पर सर्वशक्तिमान प्रभु के प्रति सार्वजनिक कर्तवय के पालन में बाधा डाली है। वह सेहत के जाम पर जाम पीता रहा, उसने औरों को उनकी मर्जी के खिलाफ अपने साथ रोका, जब वह प्रभु की सेवा के लिए नियत समय पर घुटनों के बल झूठी भक्ति जताते हुए यूनियन के प्रति सेहत का जाम पीता रहा, तो वह दुखद नजारा एक और विघटन का ही प्रदर्शन था। द्वीप के वासियों की, आसपास के सभी पड़ोसियों की, मूर्तिपूजक पोपवादियों तथा अन्यों की भारी बदनामी मोल लेते हुए प्रोटेस्टैंट धर्म की गरिमा को भग करते हुए उसने बहुधा अंधाधुन मद्यमान की पार्टियां दी हैं। कभी-कभी तो ये पार्टी रात को दो-तीन बजे तक चलती रहीं। उनके कारण प्रातःकालीन प्रार्थनाओं में प्रभु की सेवा की उपेक्षा हुई। इस