15. अस्पृश्यों का ईसाईकरण - Page 372

अस्पृश्यों का ईसाईकरण

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मेरी सांस रुकने लगी है और में स्वयं को संभाल नहीं पा रहा हूं। मेरे बाएं कूल्हे

पर एक और प्रहार किया गया, जो पहले प्रहार के किसी प्रकार कम नहीं था

और इस सबके अलावा मेरी आंख की भौंह पर चोट आई।

पहले-पहल जो अंग्रेज भारत में आकर बसे, उनकी नैतिकता का यह हाल था। इतना कहना काफी है कि 17वीं सदी के पहले 80 वर्षों में ये अधिवासी कोर्च चर्च नहीं बना सके और उसके बिना ही काम चलाते रहे। 18वीं सदी में भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

18वीं सदी में भारत में बसे अंग्रेजों की नैतिक दशा के बारे में श्री काये का कहना हैः

जहां तक वारेन हेस्टिंग्ज के लंबे प्रशासन के दौरान आंग्ल-भारतीय समाज

की दशा का संबंध है, उसकी सराहना में वस्तुतः कुछ नहीं कहा जा सकता।

.... जिन्हें अच्छी मिसाल कायम करनी चाहिए थी, उन्हीं ने अपनी निरंकुश

जीवन-शैली से ईसाई धर्म को गंभीर आघात पहुंचाया ... हेस्टिंग्ज ने दूसरे व्यक्ति

की पत्नी को उसकी मर्जी से अपना लिया_ फ्रांसिस ने बिना मर्जी के वैसा ही

किया।.... यह आशा कैसे की जा सकती थी कि ऐसी मिसालों के होते हुए

समाज के अल्प विख्यात सदस्य नैतिकता और भद्रता की ओर ध्यान देते। सच

तो यह है कि इसे स्वीकार करना ही होगा कि इस काल में भारत में अंग्रेजों

का ईसाई धर्म अति दयनीय दशा में था। लोग नशे में धुत्त हो जाते थे और

जमकर जुआ खेलते थे। देश की औरतों को रखैल के रूप में रखना आम बात

थी, अपवाद नहीं। अंग्रेज भद्रजन आमतौर पर भरे-पूरे जनानखाने रखते थे। उन

दिनों वासना भड़काने वाले आमोद-प्रमोद की कोई कमी नहीं थी। बस्तियों में,

खासकर शीत ट्टतु में, बालडांस छद्मक्रीड़ा, घ़ुड़दौड़ और थियेटर जैसी रंगरेलियों

का समा बंधा रहना था। विविधता के लिए द्वंद-युद्ध का हल्का-फुल्का मनोरंजन

भी होता था। अधिकांशतः लोग अल्पजीवी थे। उनका कौल था, जब तक जियो,

मौज मनाओ।

* * * *

वस्तुतः नशाखोरी आम बात हो गई थी और उसने उद्दंडता का रूप धारण

कर लिया था। उस काल की वह गहरी लत या फैशनेबिल बुराई बन गई थी।...

प्रेसिडेंसी वाले बड़े-बड़े नगरों में, खासकर कलकत्ता में, सार्वजनिक आमोद-प्रमोद

आम नहीं थे। उन दिनों बालडांस उत्सव, मद्यमान उत्सवों से कुछ कम थे। मद्यपान