358 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के बाद नृत्य करना संभव नहीं था और आम तौर पर उसके बाद लड़ाई-झगड़ा होता था। यदि किसी सार्वजनिक पार्टी में एक-दो द्वंद-युद्ध नहीं होता था तो वह असाधारण बात होती थी। उन दिनों सेल्बीज नामक प्रसिद्ध क्लब हुआ करता था। उस क्लब में कलकत्ता के भ्रदजनों का आम मनोरंजन था। नशे के बढ़ने के साथ-साथ उनका दांव भी बढ़ता जाता था। कभी-कभी तो नशे में धुत्त वे लोग छोटी-छोटी बातों पर सोने की 1,000 मुहरों के दांव लगा बैठते थे। ताश
खेलने वाले प्रायः रात-भर जमते रहे और यदि वह शनिवार की रात होती तो वह अगले दिन भी दिन-भर डटे रहते।
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सम्मानजनक विवाह असाधारण बात थी।.... ईस्ट इंडिया कंपनी के कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने अपनी बस्तियों की नैतिकता को सुधारने के शुभ कार्य का बीड़ा उठाया... यह सोचकर कि सम्मानजनक विवाह-रचना के साधन जुटाना एक सहायक कदम होगा, उन्होंने न केवल ‘कच्च माल’ के रूप में सैनिकों की पत्नियों को भेजा, बल्कि कुछ बेहतर माल (औरतों) को भी भेजा। वह ‘माल’ तथाकथित भद्र महिलाओं के रूप में था। वह माल उनके उन व्यापारियों तथा आढ़तियों के उपभोग के लिए था, जो विवाह के इच्छु हो सकते थे। लेकिन प्रयास सफल नहीं हुआ। जिन चंद महिलाओं ने विवाह किया, वे अपने पतियों से विमुख हो गईं। जिन महिलाओं ने विवाह नहीं किया और मांग में कोई तेजी नहीं थी, वे भी अनिश्चित स्थिति में थीं। कुछ समय तक सरकारी खर्च से उनका भरण-पोषण किया गया, पर उन्हें केवल इतना मिलता था कि भूखे मरने की नौबत नहीं आती थी। अतः यह अति स्वाभाविक ही था कि इन दयनीय प्राणियों ने कुमार्ग अपनाए और अपने रूप व सौंदर्य को बेचा। वेश्यावृत्ति की अपनी कमाई से वे केवल तेज शराब ही खरीद पाती थीं, जिसकी कि उन्हें बुरी तरह लत लग गई थी। शीघ्र ही इस निंदनीय कर्म की अपकीर्ति चारों ओर फैल गई और सूरत स्थित अध्यक्ष तथा कौंसिल ने बंबई स्थित डिप्टी-गवर्नर तथा कौंसिल को लिखा ख्1, ः
जहां आपने हमें यह सूचना दी है कि हमारी कुछ महिलाएं हमारे
मूल धर्म और सरकार के लिए कलंक का कारण बन गई हैं, हम अपेक्षा
- काये, क्रिश्चियनिटी इन इंडिया, पृ. 106