अस्पृश्यों का ईसाईकरण
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करते हैं कि प्रतिष्ठित कंपनी के नाम पर आप उन सभी को समुचित
चेतावनी दे दें कि वे अधिक संयत ईसाई की भांति आचरण करें, अन्यथा
सजा यह होगी कि उन्हें विदेश में जाने की आजादी से पूर्णतया वंचित
कर दिया जाएगा और उन्हें तब तक केवल रोटी और पानी पर गुजारा
करना पड़ेगा, जब तक कि उन्हें इंग्लैंड के लिए पानी के जहाज पर नहीं
चढ़ा दिया जाता।
प्रारंभिक ईसाइयों की नैतिकता और उनके आचरण कितने गिरे हुए थे, उसका पता उन तीन मिसालों से लगाया जा सकता है, जिन्हें समकालीन रिकार्डों से एकत्र किया गया है।
वर्ष 1809 के आसपास अपनी प्रकाशित पुस्तक ‘इंडियन वैडि मीकम’ में कप्तान विलियमसन ने कहा हैः
दो महिलाओं को एक घर में एक साथ रहने की विभिन्न घटनाओं की
मुझे जानकारी है। एक प्रौढ़ सैनिक अफसर था। उसके यहां सभी प्रकार की
कद-काठी की सोलह से कम महिलाएं नहीं थीं। जब एक मित्र ने उससे
पूछा कि इतनी ढेर सारी महिलाओं के साथ वह क्या करते हैं, तो उसने
उत्तर दिया, ‘मैं उन्हें थोड़ा-सा भात दे देता हूं ओर वे मेरे चारों ओर चक्कर
काटती रहती हैं।’ इसी सज्जन ने यूरोप से हाल में आई एक सुंदर युवती
को अपना परिचय दिया, पर जिस महिला के घर पर यह युवती ठहरी हुई
थी, उसने उसे समूची स्थिति बता दी थी, तो परिचय का अंत इस प्रकार
हुआ, ‘प्रिये, कृपा करके बताएं कि क्या आप मेजर की सोलह बीबियों के
साथ रहना पसंद करेंगी?’
भारत के अंग्रेजी में ऐसी अव्यवस्था और अनैतिकता फैली हुई थी। कोई अचरज नहीं कि भारतीयों को अचरज हुआ हो कि क्या अंग्रेज प्रभु-नाम को किसी चीज पर और किसी नैतिक व्यवस्था पर विश्वास करते भी हैं? कहा जाता है कि जब किसी भारतीय से पूछा गया कि ईसाई धर्म और ईसाइयों के बारे में उसका क्या विचार है, तो उसने अपनी टूटीफूटी अंग्रेजी में उत्तर दिया, ‘ईसाई धर्म, शैतान का धर्म, ईसाई पियक्कड़, ईसाई घोर पानी, ईसाई मारपीट, गाली-गलौज करता है।’ कौन यह कह सकता है कि उसका यह उत्तर तथ्यों के प्रतिकूल था?
यह सच है कि चर्चाधीन काल में इंग्लैंड में नैतिकता का बाहुल्य नहीं था। स्वदेश में अंग्रेज अपने जीवन की शुद्धता के लिए अधिक विख्यात नहीं थे। अतः इस बात