15. अस्पृश्यों का ईसाईकरण - Page 375

360 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की थोड़ी गुंजाइश थी कि विदेशी भूमि पर गुलछर्रे उड़ाने वाली ब्रिटिश नैतिकता स्वदेश में बौनी और डांवाडोल हो जाए। श्री काये के शब्दों में ख्1, ः पुनरुद्धार की दरबारी लंपटता ने समूचे देश को भ्रष्ट कर दिया था। हमारे दैनिक जीवन की शैली पर व्हाइटहाल की छाप थी और वह कंपनी के जहाजों में लदकर हमारे दुस्साहसियों के साथ बाहर चली गई और हम निश्चय ही कह सकते हैं कि एक गैर-ईसाई देश में उसे आसानी से मिटाया नहीं जा सकता था।’

17वीं और 18वीं सदी में अंग्रेजों की इस अनैतिकता के लिएजो भी बहाना रहा हो, तथ्य यह है कि वह इस बात का पर्याप्त कारण थी कि ईसाई धर्म पर कलंक लगे और उसके प्रचार-प्रसार में अत्यधिक कठिनाई पैदा हो।

भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में दूसरी बाधा थी, ईसाईकरण के क्षेत्र में वर्चस्व के लिए कैथोलिक तथा गैर-कैथोलिक मिशनों का आपसी संघर्ष।

भारत में ईसाई धर्म के प्रसार के क्षेत्र में कैथोलिक चर्च का प्रवेश 1541 में फ्रांसिस जेवियर के आगमन से हुआ। जीसस की नई सोसाइटी के वह पहले मिशनरी थे। इस सोसाइटी का गठन पोप के प्रमुख का समर्थन करने के लिए किया गया था। जब कैथोलिक चर्च ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया तो उससे पहले भारत में, विशेषतः दक्षिण में, ईसाइयों की भारी संख्या थी, पर वे सीरियाई चर्च को मानते थे। ये सीरियाई ईसाई काफी अर्से से मलाबार के समुद्र तट पर बसे हुए थे और वे स्वयं का धर्मदूत टामस का वंशज मानते थे। टामस के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ‘सीरिया और सिलीसिया जाकर चर्चों को अनुरूपता प्रदान की।’ वे सीरिया को अपना आध्यात्मिक गढ़ मानते थे। वे बेबीलोन के धर्माध्यक्ष के प्रभुत्व को स्वीकार करते थे। रोम तथा पोप की प्रभुता के उत्थान-काल में मुसलमानी शक्ति ने बीच के देशों को रौंद डाला था और पश्चिम के देशों के लिए उसने भारत के द्वार बंद कर दिए थे। इसके कारण भारत के सीरियाई चर्च रोमन कैथोलिक चर्च के प्रभुत्व में आने से बच गए थे। यहां मेरा इस सवाल से कोई सरोकार नहीं है कि कैथोलिक चर्च का ईसाई धर्म अथवा सीरियाई चर्च का ईसाई धर्म ईसाई का सच्चा स्वरूप था। लेकिन तथ्य ये हैं कि भारत में कैथोलिक चर्च का प्रतिनिधित्व करने वाले पुर्तगाली सीरियाई चर्चों को देखकर विक्षुब्ध हो गए। उन्होंने कहा कि सीरियाई चर्च अल्प छद्मवेश में गैर-ईसाई मंदिर ही हैं। सीरियाई ईसाई पुर्तमाल के रोमन कैथोलिकों के कुलषित स्पर्श से बचने के लिए घबराकर पीछे हट गए। उन्होंने स्वयं को ईसाई कहा, मूर्तिपूजक नहीं। इसके अलावा मलाबार के ईसाई

  1. काये, क्रिश्चियनिटी इन इंडिया, पृ. 44