362 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
खुलेआम बेबीलोन के प्रधान बिशप की निंदा करते हुए उन्हें घातक विघटनकारी कहा और उनके वर्चस्व को स्वीकार करना धर्मद्रोह करार दिया। फिर उसने एक आदेश जारी किया। उसके अनुसार न तो कोई भी व्यक्ति रोमन धर्माध्यक्ष के अलावा किसी अन्य का वर्चस्व स्वीकार कर सकता था और न ही अपने चर्च की सेवाओं में सीरियाई धर्माध्यक्ष का कोई उल्लेख कर सकता था। ऐसा करके उसने
खुलेआम सीरियाई चर्चों के अध्यक्ष का धर्म से बहिष्कार कर दिया और विमूढ़ उप-बिशप से बहिष्कार के हुक्मनामे पर दस्तखत करने के लिए कहा। भयभीत, भ्रमित तथा भाग्यहीन उप-बिशप ने धर्म-त्याग के दस्तावेज पर अपना नाम टांक दिया और उसे चर्च के द्वार पर सरेआम चस्पां कर दिया गया।
कैसी दोहरी मार। एक ओर असह्य अपमान और दूसरी ओर घिनौना समझौता। इसके कारण न केवल प्रधान बिशप के विरुद्ध, बल्कि अपने धर्माध्यक्ष के विरुद्ध भी लोगों का क्रोध भड़क उठा। जब भारी संख्या में उत्तेजित जनसमूह को शांत करने के लिए उनका अपना उप-बिशप सामने आया, तो उसके सामने दुष्कर कार्य था। हो सकता था कि वे अपने भ्रष्ट किए गए समुद्र तटों से पुर्तगाली घुसपैठियों को
खदेड़ने का एक अंतिम प्रयास करने का साहस करते, लेकिन उप-बिशप ने उनसे धैर्य धारण करने का अनुरोध किया और अपनी कमजोरी के लिए क्षमा मांगी। उसने आग्रह किया कि छल व कौशल प्रतिशोध से बेहतर सिद्ध होगा। उसने वचन दिया कि अपनी करनी के बावजूद वह अपने धर्म की रक्षा करेगा और उन्हें ललकारा कि पोप के अतिक्रमण का वे डटकर विरोध करें। सहमति की हुंकार के साथ उन्होंने शपथ ली कि वे पोप के प्रभुत्व के आगे कभी नतमस्तक नहीं होंगे। उन्होंने संघर्ष को जारी रखने के लिए अपनी कमर कस ली।
लेकिन मेन्जेज इतना अधिक साधन-संपन्न व्यक्ति था कि उसे इस संघर्ष में हराया नहीं जा सकता था। उसकी ऊर्जा और लगन अटूट थी। उसका कौशल अपार था। जब हमले का एक हथियार कारगर नहीं होता था, तो वह दूसरे का इस्तेमाल करता था। हिंसा का स्थान छल ने ले लिया। जिन पर उसकी धोंस नहीं चली, उन्हें उसे घूस दी और जिन्हें वह डरा नहीं सका, उसने उनसे मीठी-मीठी अपील की। और धीरे-धीरे वह सफल हो गया। एक के बाद दूसरा चर्च घुटने टेकने लगा। उसके सामने खतरे और कठिनाइयां आईं। प्रायः उसका पाला हिंसात्मक प्रतिरोध से पड़ता था और प्रायः वह उसका दमन कर देता था। जब सीरियाई ईसाईयों की तादाद उसके बूते से बाहर की होती थी तो वह देशी नरेशों की मदद ले लेता था। प्रतिरोध से ग्रस्त और बहिष्कार से त्रस्त दुखी सीरियाई उप-बिशप ने अंततः रोमन धर्माधिकारी के आगे घुटने टेक दिए। मेन्जेज ने धर्मसभा बुलाने के लिए