अस्पृश्यों का ईसाईकरण
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आदेश जारी कर दिया। 20 जून, 1599 को डियामपेर में चर्चों की धर्मसभा हुई। प्रथम अधिवेशन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन उसमें काफी गुपचुप बड़बड़ाहट हुई। दूसरे अधिवेशन में आदेश पढ़कर सुनाए गए। उसमें अनुष्ठान के उस दुखद बिंदु पर टोकाटोकी हुई, जब धर्म-स्वीकृति की घोषणा के बाद प्रथम बिशप ने बेबीलोन के अधिधर्माध्यक्ष से संबंध तोड़कर उनकी लानत-मलामत की। इस पर सीरियाई ईसाइयों के सब्र का बांध टूट गया। उन्होंने खुलेआम विरोध करते हुए कहा कि धर्म-स्वीकृति की कोई जरूरत नहीं है। उनका आग्रह था कि ऐसी स्वीकृति का अर्थ होगा कि धर्मसभा के जुड़ने से पूर्व वे ईसाई नहीं थे। लेकिन मेन्जेज ने उनकी आशंकाओं और संदेहों को दूर कर दिया। उसने सबके सामने स्वयं अपने और पूर्वी चर्चों के नाम से स्वीकारोक्ति की। एक सीरियाई पादरी ने दुभाषिए का काम किया। उसने स्वीकारोक्ति को मलाबारी भाषा से पढ़कर सुनाया और उसके बाद एकत्रित विशाल जनसमुदाय ने उसे घुटनों के बल बैठकर शब्दशः दुहराया। और इस प्रकार सीरियाई ईसाई पोप के प्रभुत्व के आगे नतमस्तक हुए।
मेन्जेज प्राप्त प्रलाभों में वृद्धि करने के लिए कृत-संकल्प था। अंतः उसने निष्क्रियता का सहारा नहीं लिया और वह विगत सफलताओं के नशे में ही मस्त नहीं रहा। चाहे उसे प्रेरित करने के लिए धार्मिक उन्माद रहा हो या लौकिक महत्वकांक्षा, पर उसने अपने प्रयास को ढीला नहीं किया। उसने अनुभव किया कि सीरियाई ईसाईयों की गर्दन पर प्रभुत्व का जुआ रख देने से ही काम नहीं चलेगा। अतः प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए उसने छल, बल, कौशल के सभी हथकंडे अपनाने का प्रयास किया। चर्चों ने मनहूस समर्पण कर दिया, लेकिन उनके बीच तीव्र बुद्धि और सूक्षम दृष्टि वाले लोग भी थे। 17वीं सदी के प्रारंभ होते ही उन्होंने भविष्य की ओर आशा की दृष्टि से देखा। उन्हें पूर्ण विश्वास हो चला कि पूर्व पुर्तगालियों के वैभव के पतन के अकाट्य लक्षणों को साफ-साफ देखा जा सकता है। सीरियाई चर्चों के लिए तब आशा की किरण थी। मेन्जेज ने घोर अत्याचार किए। उसने पादरियों को उनकी पत्नियों से जुदा कर दिया। उसने चर्चों के सदस्यों को मामूली आधारों पर बहिष्कृत कर दिया। उसने उन समूचे सीरियाई रिकार्डों को नष्ट कर दिया, जिनमें उनके धर्म की प्राचीन पवित्रता के प्रमाण मौजूद थे। इस अंतिम कृत्य की अपूरणीय बर्बरता को भुलाया या क्षमा नहीं किया जा सकता था, लेकिन अन्य सभी कष्टों एवं क्लेशों के बीच यह विचार सांत्वना प्रदान करता था कि यह अत्याचार अस्थाई है। गिब्बन लिखते हैंः ‘साठ वर्षो तक दासता और पाखंड को बड़े धैर्य से सहन किया गया, लेकिन जैसे ही डचों