15. अस्पृश्यों का ईसाईकरण - Page 379

364 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के साहस और उद्यम ने पुर्तगाली साम्राज्य की जड़ों को हिलाया, वैसे ही सीरियाई ईसाइयों ने जोर-शोर से अपने पूर्वजों के धर्म का डंका बजा दिया। जेसुइट अपनी दुराचारपूर्ण सत्ता की रक्षा न कर सके। चालीस हजार ईसाइयों की सशक्त भुजाएं ढहते हुए अत्याचारी के खिलाफ तन गईं और भारतीय उप-बिशप ने बिशप का रूप धारण कर लिया। उसके बाद तो बेबीलोन के अधि-धर्माध्यक्ष ने अपने उपहारों तथा सीरियाई मिशनरियों की एक ताजी खेप ही भेज दी थी। संक्षेप में, ये मेन्जेज के दमन के परिणाम थे। छह मास के भीतर ही उस महत्वाकांक्षी तथा निरंकुश धर्माधिकारी ने सीरीयाई चर्च को दास बनाकर रख दिया और चालीस वर्षों तक उन्होंने रोम की कष्टदायी बेडि़यों को धारण किया। लेकिन मेन्जेज अपनी निजी शक्ति पर ही उछला-कूदा। उसने लौकिक विजय प्राप्त की और लौकिक भुजबल का सहारा लिया। श्री हाउफ लिखते हैंः ‘उसकी मिसाल को भावी ईसाई मिशनरियों के लिए यह चेतावनी समझा जाए कि वे उस चट्टान से दूर रहें, जिस पर चढकर वह ढेर हो गया था। आस्था और प्रभु-परायणता के अलावा और कोई चीज चर्च की समृद्धि नहीं कर सकती। इनके अभाव में धर्माधिकारी के मंसूबे, भले ही वे भव्य दीख पड़ें, शीघ्र ही मिट्टी में मिल गए। दैवी विधान के हस्तक्षेप के रूप में यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भारत मे पुर्तगाली हित का पराभव तो उसी समय प्रारंभ हो गया था, जब उसके मन में यह अहंकार आ गया था कि उसने पुर्तगाली हित की स्थाई नींव डाल दी थी।’

कैथोलिक चर्च और प्रोटेस्टैंट मिशनरियों के बीच कोई खुला संघर्ष तो नहीं था। लेकिन उनके बीच काफी होड़ थी। उसके कारण अहंमन्यता बनी रही और सहयोग का अभाव था। इस अभाव में भी ईसाई धर्म के तीव्र विकास में बाधा डाली।

ईसाई धर्म के मंद विकास का तीसरा कारण यह था कि प्रचार के प्रभारी ईसाई मिशनरियों ने गलत रवैया अपनाया। प्रारंभिक ईसाई मिशनरी ने अपना अभियान इस प्रकार शुरू किया कि उसने ईसाई तथा हिंदू धर्मों के तुलनात्मक गुण-दोषों के बारे में विद्वान ब्राह्मणों से सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ किए। यह एक अजब तरीका था। लेकिन इसके पीछे साजिश थी। ईसाई मिशनरी का विचार था कि जनसाधारण के धर्म-परिवर्तन का उसका काम आसान हो जाएगा, यदि वह ब्राह्मण तथा हिंदुओं के उच्च वर्गों का धर्म-परिवर्तन करने में सफल होगा, क्योंकि उनका और ब्राह्मणों का प्रभाव जनसाधारण पर था। ब्राह्मण के धर्म-परिवर्तन करने का सबसे सरल उपाय यह था कि उसे शास्त्रार्थ में हरा दिया जाए और जता दिया जाए कि उसका धर्म गलत था। ईसाई मिशनरी ब्राह्मण से संपर्क स्थापित करना चाहता था। कोई कारण