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अस्पृश्यों का ईसाईकरण

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नहीं दीख पड़ता कि क्योंकि मिशनरियों ने इतने सारे स्कूल, कालिज, अस्पताल आदि

खोले, सिवाए इसके कि ईसाई मिशनरी ब्राह्मण से संपर्क स्थापित करना चाहता था। अनेकों ने अब यह अनुभव कर लिया है कि ईसाई मिशनरी छला गया है। ब्राह्मण तथा उच्च वर्गों ने ईसाई मिशनों द्वारा संचालित संस्थाओं का पूर्ण लाभ उठाया है। लेकिन शायद ही उनमें से किसी ने उस धर्म की ओर ध्यान दिया हो, इन संस्थाओं को जन्म दिया।

इसमें कोई अचरज की बात नहीं है। ईसाई मिशनरी ने ब्राह्मण तथा हिंदुओं के उच्च वर्गों के पीछे लगने का जो प्रयास किया, उसे तो विफल होना ही था। हिंदू धर्म तथा ईसाई धर्म के बीच शास्त्रार्थ के लिए कोई समान आधार नहीं होगा और जहां कोई समान आधार होगा भी, वहां हिंदू, सदैव ईसाई को मात दे सकता है।

हिंदुओं तथा ईसाइयों के बीच शास्त्रार्थ के लिए कोई समान आधार नहीं हो सकता, उसका कारण यह है कि धर्म-विज्ञान और तत्व-ज्ञान के संबंधों के प्रति दोनों का दृष्टिकोण नितांत भिन्न है। जैसा कि श्री बर्न ख्1, ने ठीक ही कहा हैः

शिक्षित हिंदू जब धार्मिक मसलों पर विचार करता है तो वह धर्म-विज्ञान

को तत्व-ज्ञान से अलग करने से इंकार कर देता है। जो उसे समुचित सृष्टिशास्त्र

दीख पड़ेगा, उसी पर वह आग्रह करेगा। हिंदू धर्म पर विचार करते समय

यह जता दिया गया है कि उसकी प्रचलित प्रवृत्ति सर्वेश्वरवादी है। भले ही

कम-से-कम दो हजार वर्षों से तो बराबर ऐसे पंथों का आविर्भाव होता रहा

है, जो परमात्मा और आत्मा के द्वैत पर आग्रह करते रहे हैं, फिर भी सदैव

घूम-फिरकर सर्वेश्वरवाद की ओर मुड़ जाने की प्रवृत्ति बनी रही है। यह

माना जाता है कि वर्तमान संसार माया द्वारा रचित भ्रम है। लेकिन औसत ईसाई

ज्यादा तत्व-ज्ञान नहीं बघारता और मानता है कि सामान्यतः वह अपनी धार्मिक

आस्थाओं में विश्लेषण को प्रधानता देता है, अनिवार्यता को नहीं। अनिवार्य

है कि व्यक्ति को जिस चिंतन-शैली का आदर करना सिखाया जाता है, वही

उसके निष्कर्षों को प्रभावित करती है। मुझे ऐसा लगता है कि यह भी एक

कारण है, जिसकी वजह से अधिकांश शिक्षित हिंदू ईसाई धर्म ग्रहण करने

के विचार को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। एक ठोस मिसला देना चाहूंगा।

सामान्य शिक्षित हिंदू इस आस्था की हंसी उड़ता है कि प्रभु ने ब्राह्मण की

रचना शून्यता से की। भले ही वह रचना में विश्वास करे, लेकिन वह यह

  1. भारत की जनगणना, 1901, खंड 16, एन.डब्ल्यू. पैंडबुढ, रिपोर्ट भाग 1, पृ. 98