366 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भी मानता है कि दोनों की जरूरत है µ एक भौतिक कारण (पदार्थ) की
और एक (सृष्टा) की भी। जहां उसकी आस्था निरी सर्वेश्वरवादी है, वहां
भी वह ऐतिहासिक प्रमाणों की ओर ध्यान नहीं देता। एक और कठिनाई एक
बुनियादी बिंदु के बारे में पुनर्जन्म की आस्था के कारण होती है। यह आस्था
इस विचार पर आधारित है कि व्यक्ति को अपनी मुक्ति या मोक्ष की समस्या
को स्वयं ही हल करना होगा और इस प्रकार वह दैवी क्षतिपूर्ति की आस्था
से नितांत भिन्न है।
इस प्रकार हिंदू तत्व-ज्ञान की वाणी में और ईसाई धर्म-विज्ञान की वाणी में बोलता है। इस प्रकार उनके बीच आकलन अथवा सराहना अथवा निंदा के लिए कोई समान आधार नहीं है। जहां तक दोनों का संबंध धर्म-विज्ञान से है, अर्थात् ईसाइयों का अपने प्रभु और उनके बेटे के रूप में यीशु से है और हिदुओं को अपने प्रभु और उनके अवतारों से है, एक पर दूसरे की श्रेष्ठता उनकी लीलाओं या उनके चमत्कारों पर निर्भर करती है। इस संबंध में यह नितांत प्रत्यक्ष है कि हिंदू धर्म-विज्ञान ईसाई धर्म-विज्ञान को मात दे सकता है। जिस प्रकार ईसाई धर्म तत्व-ज्ञान के अभाव के कारण ब्राह्मण और शिक्षित हिंदू वर्ग को आकर्षित नहीं कर पाता, ठीक उसी प्रकार हिंदू धर्म-विज्ञान में चमत्कारों की इतनी रेलपेल है कि तुलना में उसके आगे ईसाई धर्म-विज्ञान फीका पड़ जाता है। लगता है कि रोमन कैथोलिक पादरी फादर ग्रेगरी ने इस कठिनाई को अनुभव किया था। चूंकि उनका दृष्टिकोण दिलचस्प भी है और वह नसीहत भी देता है, अतः मैं कर्नल स्लीमैन की पुस्तक से उद्धरण देता हूं, इसका उल्लेख है। कर्नल स्लीमैन कहते हैं ख्1, ः
एक शाम तो रोमन कैथोलिक पादरी फादर ग्रेगरी ने हमारे साथ भोजन किया।
इस अवसर पर टेबिल पर मेजर गौडबाई ने उनसे पूछा, ‘लोगों के बीच हमारा
धर्म क्या प्रगति कर रहा है?’
‘कैसी प्रगति?’ उन्होंने कहा, ‘ऐसे लोगों के बीच कोई प्रगति कभी करने
की कोई आशा हम कैसे कर सकते हैं। जैसे ही हम उनसे यीशु के चमत्कारों
की चर्चा शुरू करते हैं, वैसे ही वे कृष्ण की अत्यधिक अद्भुत लीलाओं की
चर्चा हमसे करने लगते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण ने तो अपनी नन्हीं अंगुली
पर छत्र के रूप में गोवर्धन पर्वत को ही उठा लिया था और ग्वालों की भंयकर
वर्षा से रक्षा की थी।’
- रैम्बिल्स एंड रिकलैक्शन्स, खंड 1, अध्याय 53, पृ. 407