अस्पृश्यों का ईसाईकरण
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‘हिंदू कभी भी हमारे धर्मगं्रथों के चमत्कारों और उनकी भविष्यवाणियों के किसी अंश पर संदेह नहीं करते। वे शब्दशः उन पर विश्वास करते हैं और अचरज उन्हें केवल इस बात पर होता है कि उनके अपने धर्मग्रंथों के अटूट श्रद्धायोग्य चमत्कारों की तुलना में हमारे चमत्कार बहुत कम चमत्कारपूर्ण हैं। जो लोग यह विश्वास करते हैं कि विष्णु के दो अवतारों, राम और कृष्ण, के युद्धों तथा शौर्य-गाथाओं के इतिहास की रचना पृथ्वी पर वास्तव में घटित होने वाले इन युद्धों तथा शौर्य-गाथाओं से कोई पचास हजार साल पहले हुई थी, वे निश्चय ही किसी अन्य ग्रंथ में वर्णित किसी भी भविष्यवाणी को सच मान लेंगे। जहां तक चमत्कारों का संबंध है, उनके लिए कुछ भी अति असाधारण नहीं है। यदि कोई प्रतिष्ठित ईसाई किसी हिंदू को यह जताने का प्रयास करें कि ‘बाइबिल’ के कुछ सिद्धांतों को प्रतिपादित करने के लिए संत पौल चांद और सूरज को धरती पर ले आए थे, और उन्होंने पुनः उन्हें टेनिस की गेदों की भांति उनके स्थानों पर बिठा दिया था और तीनों ग्रहों को रत्तीभर भी नुकसान नहीं हुआ था (एवं लिखित), तो मेरा विचार है कि वह उसकी सच्चाई के बारे में तनिक भी संदेह नहीं करेगा, लेकिन तुरंत ही वह ग्वालों के मनोरंजन के लिए कृष्ण द्वारा की गई और भी असाधारण लीला का स्मरण करेगा और बड़े भोलेपन से उसका बखान करेगा।’
जैसा कि भारत की घटनाओं से पता चलता है, यह एक गलत रवैया था। निश्चय ही यह रवैया यीशु तथा उनके चेलों द्वारा अपनाए गए रवैए से एकदम विपरीत था। गिब्बन ने ईसाई धर्म के विकास का विवरण दिया है। उससे पता चलता है कि मसीहा और उनके चेलों ने किस सिरे से शुरूआत की थी। वह कहते हैंः
भले ही अपर्ण हो, पर ईसाई धर्म की प्रगति के इस निष्पक्ष सर्वेक्षण से यह संभव दीख पड़ता है कि उसके धर्मान्तरितों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि एक ओर भय तो दूसरी ओर श्रद्धा के कारण हुई हो। ओरिजेन के अकाट्य प्रमाण के अनुसार अविश्वासी जगत की बहुसंख्या की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या अति अल्प थी, लेकिन क्योंकि हमारे पास कोई निश्चित सूचना नहीं है, अतः यह निर्धारण करना भी असंभव है और यह अनुमान लगाना भी कठिन है कि आदि ईसाइयों की वास्तविक संख्या कितनी थी। लेकिन यदि एंटियोक और रोम के उदाहरणों से जो सर्वाधिक अनुकूल आकलन किया जा सकता है, वह भी हमें यह कल्पना करने की अनुमति नहीं देगा कि कान्स्टेन्टाइन के महत्वपूर्ण धर्म-परिवर्तन से पूर्व ही क्रास के झंडे तले साम्राज्य की प्रजा के बीसवें भाग ने अपने आपको दर्ज करा लिया था। लेकिन लगता है कि श्रद्धा, लगन और एकजुटता की उनकी आदतों ने उनकी संख्या में वृद्धि की और जिन कारणों ने