368 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उनकी भावी वृद्धि में योगदान किया, उन्होंने ही उनकी वास्तविक संख्या को अधिक उजागर किया और अधिक विशालता प्रदान की।
सभ्य समाज का गठन ही कुछ ऐसा है कि जहां चंद लोगों पर धन, सम्मान और ज्ञान की विशिष्ट छाप लग जाती है, वहां जनसमूह गुमनामी, अज्ञान और निर्धनता का दंड भोगता है। चूंकि ईसाई धर्म ने समूची मानव जाति के हित का बीड़ा उठाया है, अतः उसके लिए अनिवार्य है कि उच्च वर्गों की अपेक्षा वह निम्न वर्गों के लोगों को कहीं अधिक संख्या में धर्मान्तरित करे। इस निर्दोष तथा सहज परिस्थिति को एक अति पैने आरोप के रूप में परिणत किया गया है। लगता है कि ईसाई धर्म के पक्षधर इस आरोप का कम जोरदार खंडन करते हैं। पर उसके विरोधी उसे अधिक जोर से उछालते हैं कि ईसाइयों के नए पंथ में लगभग पूर्णतः जन-सागर का तलछट है। महिलाएं, भिखारी और दास, किसना और मैकेनिक तथा लड़के उसमें है। भिखारी और कभी-कभी मिशनरियों का परिचय उन धनी तथा उदात्त परिवारों से करा सकते हैं, जिनमें उनका संबंध रहता है। (अंधविश्वासी तथा विद्वेषी वर्ग का आरोप है) कि ये दीन-हीन शिक्षक जनता के बीच जितने गूंगे हैं, उतने ही वाचाल और हठधर्मी वे निजी वर्ग के बीच हैं। जहां वे बड़ी सावधानी से दार्शनिकों की भीषण टक्कर से कतराते हैं, वहां वे असभ्य तथा गंवार लोगों से मेलजोल बढ़ाते हैं और उन लोगों के मन में धीरे-धीरे अपना स्थान बनाते हैं। उनकी उम्र, उनका लिंग अथवा उनकी शिक्षा अंधविश्वासपूर्ण आतंकों की भावना को ग्रहण करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र है।
भले ही इस मंडन-दृष्टि में मंडन का क्षीण आभास मिलता हो, पर उसके गहरे रंगों और विकृत रूप के कारण उसकी खंडन-दृष्टि उजागर हो जाती है। जैसे-जैस यीशु का विनम्र धर्म जगत में फैलता गया, वैसे-वैसे उसे ऐसे अनेक लोगों ने ग्रहण किया, जिन्हें प्रकृति अथवा भाग्य के लाभों का कुछ प्रसाद मिला। जिस एरिस्टाइड्स ने सम्राट हैड्रियन के समक्ष वाग्मितापूर्ण मंडन-पक्ष प्रस्तुत किया, वह एथेनियाई दार्शनिक था। जस्टिन मार्टिर ने दिव्य-ज्ञान जेनो अथवा अरस्तू के, पाइथागोरस और प्लेटो के विद्यालयों में प्राप्त किया। उसके बाद ही सौभाग्य से वृद्ध पुरुष अथवा देवदूत ने उन्हें संबोधित किया और उनका ध्यान यहूदी पैगंबरों के अध्ययन की ओर आकृष्ट किया। अलेक्जांड्रिया के क्लीमांजों (मार्कट्वेन आदि) ने बहुत कुछ विस्तृत अध्ययन ग्रीक में और टर्टूल्लियन ने लैटिन में किया था। जुलियस अफ्रीकैनस और ओरिजेन ने भी अपने समय का अधिकांश ज्ञान