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धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति

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आप चिकित्सा-सहायता करते हैं तो आप पुरस्कार के रूप में चाहते हैं

कि आपके मरीज ईसाई बन जाएं। ख्2,

अस्पृश्यों के बारे में वह कहते हैंः

IV. निश्चय ही मेरा विचार है... कि हरिजनों का तथा भारतीयों का विशाल

जनसमूह ईसाई धर्म के प्रस्तुतीकरण को नहीं समझ सकता और सामान्यतः

धर्म-परिवर्तन, जहां भी वह किया गया है, आध्यात्मिकता की किसी भी

दृष्टि से आध्यात्मिक कार्य नहीं रहा है। वे तो सुविधा के लालच पर

किए गए धर्म-परिवर्तन हैं। ख्3, जहां तक .... सापेक्ष गुण-दोषों के बीच

भेद करने की बात है, उनकी (हरिजनों) स्थिति गाय से बेहतर नहीं है।

हरिजनों के पास न दिमाग है, न बुद्धि है और न ईश्वर और अनीश्वर

के अंतर को समझने की योग्यता है। ख्4,

ईसाई मिशनों को क्या करना उचित होगा, उसके बारे में श्री गांधी सलाह देते हैं, पर उनकी भाषा कुछ अप्रिय है। वह कहते हैंः

यदि ईसाई मिशनरी ईमानदारी से काम करेंगे... तो उन्हें हरिजनों के धर्म-परिवर्तन की भद्दी होड़ छोड़नी होगी।....

.... भूल जाइए कि आप गैर-ईसाइयों के देश में आए हैं और सोचिए

कि आपकी भांति वे भी प्रभु की खोज में हैं, जरा अनुभव कीजिए कि

आप वहां उन्हें अपनी आध्यात्मिक संपदा देने नहीं जा रहे हैं, बल्कि आप

वहां भौतिक संपदा देंगे, जिसका आपके पास काफी भंडार है। फिर आप

बिना किसी मानसिक संकोच के कार्य करेंगे और उसके द्वारा आप अपना

आध्यात्मिक खजाना देंगे। मुझे जानकारी है कि आप मानसिक संकोच से

ग्रस्त हैं, यानी आप सेवा के बदले किसी व्यक्ति से धर्म-परिवर्तन की आशा

करते हैं, वह मेरे और आपके बीच खाई पैदा करती है।

भारत का इतिहास ही भिन्न प्रकार से लिखा जाता, यदि ईसाई भारत में

हमारे बीच भाइयों की भांति रहने के लिए आते और यदि कोई सुरभि है तो

उसे हमारी भूमि में व्याप्त कर देते।

  1. हरिजन, 1937, पृ. 137

  2. वही, 18, जुलाई 1936, पृ. 178

  3. वही, 1936, पृ. 140-41

  4. वही, 1936, पृ. 360