376 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ईसाई मिशनों तथा उनके कार्य के प्रति श्री गांधी का यह विरोध काफी हाल का है। जहां तक मुझे जानकारी है, वह येवला निर्णय से परे का नहीं हो सकता।
वह हाल का भी है और विचित्र भी। मेरी जानकारी है कि इस्लाम में अस्पृश्यों को शामिल किए जाने के प्रति इतनी स्पष्ट और दृढ़ रीति से विरोध की कोई घोषणा उन्होंने नहीं की है। अस्पृश्यों को अपने धर्म में शामिल करने की अपनी योजना को मुसलमानों ने गोपनीय नहीं रखा है। जब 1923 में कोकोनाडा में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ था तो उसकी अध्यक्षता करते हुए मौलना मोहम्मद अली ने कांग्रेस के मंच से खुलेआम इस योजना की घोषणा की थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में मौलाना ने साफ-साफ कहा थाः
(हिंदुओं और मुसलमानों के बीच) आलमों और पीपल के पेड़ों और गाजे-बाजे
के साथ जुलूसों के बारे में झगड़े वास्तव में बचकाना बातें हैं। लेकिन एक प्रश्न
है, जिसे अमैत्रीपूर्ण कार्य की शिकायत के लिए सहज ही आधार बनाया जा सकता
है, यदि सांप्रदायिक गतिविधियों का शांति के साथ समन्वय नहीं किया जाता।
यह सवाल है दलित वर्गों के धर्म-परिवर्तन का, यदि हिंदू समाज उन्हें तेजी से
आत्मसात नहीं करता। ईसाई मिशनरी पहले ही जुटे हुए हैं और कोई भी उनसे
लड़ाई-झगड़ा नहीं करता। लेकिन जैसे ही कोई मुस्लिम मिशनरी सोसाइटी उस
प्रयोजन के लिए बनाई जाती है, वैसे ही हिंदू प्रेस में चीखने-चिल्लाने की पूरी
गुंजाइश पैदा हो जाती है। एक प्रभावशाली तथा धनवान सज्जन ने मुझे सुझाव दिया
है कि वह दलित वर्गों के धर्म-परिवर्तन के लिए बड़े पैमाने पर (मुस्लिम) मिशनरी
सोसाइटी का गठन कर सकते हैं। उनका कहना है कि यह संभव होना चाहिए कि
प्रमुख हिंदू महानुभावों के साथ समझौता हो जाए और देश को दो अलग-अलग
क्षेत्रों में बांट दिया जाए, जहां हिंदू और मुसलमान मिशनरी अपने-अपने इलाकों
में काम कर सकें। हर संप्रदाय हर वर्ष या उससे अधिक अवधि के लिए, यदि
आवश्यक हो, आकलन तैयार करे कि वह कितनी संख्या में लोगों को आत्मसात
या धर्म में शामिल करने के लिए तैयार हैं। निश्चय ही इन आंकड़ों का आधार
यह होगा कि प्रत्येक के पास कितने कार्यकर्ता और कितनी पूंजी है, और उसे
पिछली अवधि के वास्तविक आंकड़ों के आधार पर परखा जाएगा। इस प्रकार
हर संप्रदाय को छूट होगी कि वह आत्मसातकरण और धर्म-परिवर्तन या सुधार
का कार्य कर सकें और आपसी टकराव की भी गुंजाइश न रहे।
इससे अधिक स्पष्टवादिता और क्या हो सकती है। कांग्रेस के मंच से इस घोषणा से अधिक व्यावहारिक और दुनियादारी की बात और क्या हो सकती है। लेकिन मुझे पता नहीं है कि श्री गांधी ने कभी उसकी आलोचना उस प्रकार से की है, जिस