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धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति

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प्रकार अस्पृश्यों के धर्म-परिवर्तन के लिए ईसाई मिशनों के प्रयास की निंदा अब वह कर रहे हैं। श्री गांधी के शिविर से किसी ने भी इस अमर्यादित मुस्लिम सुझाव का प्रतिरोध नहीं किया है। शायद वे ऐसा कर भी नहीं सकते, क्योंकि कांग्रेसी हिंदुओं का विचार है कि मुसलमान जिस बात को अपना मजहबी फर्ज मानें, उसे पूरा करने में मुसलमानों की मदद करना उनका कर्तव्य है। उनका विचार है कि धर्म-परिवर्तन मुसलमानों का मजहबी फर्ज है और उससे इंकार नहीं किया जा सकता। जो भी हो, जैसा कि 1920 में जार्ज जोसेफ ने कहा था, उसके अनुसार कांग्रेस के हिंदू नेताओं का विचार था, ‘हिंदुओं का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे जजीरुत-अल-अरब में अरबों पर तुर्की की खिलाफत को बरकरार रखने में मुसलमानों की सहायता करें, क्योंकि मुस्लिम धर्म-विज्ञानियों तथा राजनेताओं ने हमें आश्वासन दिलाया है कि यह उनकी मजहबी फर्ज है।’ यह अस्वाभाविक बात थी, क्योंकि इसका अर्थ था अरबों पर विदेशी हुकूमत को बनाए रखना, लेकिन हिंदुओं को इसे अपने गले से नीचे उतारना पड़ा, क्योंकि उनसे यह आग्रह किया गया कि वह हिंदुओं के धार्मिक कर्तव्य का हिस्सा है। ख्1, यदि यह सच है तो धर्म-परिवर्तन के अभियान में गांधी ईसाइयों की मदद क्यों नहीं करते, क्योंकि धर्म-परिवर्तन भी उनके धर्म कर्तव्य की पूर्ति है।

अतः यह समझ में नहीं आता कि आज इस कारण अलग मापदंड क्यों अपनाया जा रहा है कि ईसाई उसमें जुटे हुए हैं। अतः श्री जार्ज जोसेफ ने सीमा का उल्लंघन नहीं किया, जब उन्होंने कहाः

एकमात्र अंतर यह है कि मुस्लिमों की संख्या साढ़े सात करोड़ और ईसाइयों

की केवल 60 लाख है। मुस्लिमों से दोस्ती करना लाभकारी हो सकता है, क्योंकि

वे राष्ट्रवाद के मार्ग का कांटा बन सकते हैं। ईसाइयों का कोई महत्व नहीं है,

क्योंकि वे अल्प संख्या में हैं।

श्री गांधी मुसलमान तथा ईसाइयों की सापेक्ष संख्या और भारतीय राजनीति में उनके सापेक्ष महत्व जैसी बातों से प्रभावित होते हैं, यह बात उस शब्दावलि से स्पष्ट हो जाती है, जिसे वह उस निंदा के लिए इस्तेमाल करते हैं, जिसे वह ‘प्रचार की निंदात्मक शैली’ कहते हैं। जब ऐसा प्रचार ईसाई मिशनरियों की ओर से होता है तो वह उनकी निंदा के लिए निम्न भाषा का प्रयोग करते हैं। (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में उद्धरण नहीं है µ संपादक)

दूसरी ओर जब वह मुस्लिमों की ओर से होने वाले प्रचार का विरोध करते हैं, तो वह केवल इतना कहते है ख्2, ः

  1. हरिजन, 8 फरवरी, 1936, पृ. 415

  2. वही, हरिजन, 8 अगस्त, 1936