378 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कैसे खेद की बात है कि मिशन में लोगों को लुभाने के लिए धर्म को भद्दे
भौतिकवाद के घटिया स्तर पर पटक दिया जाता है, जिसके पैरों तले करोड़ों
मानव-प्राणियो की चिरपोषित भावनाओं को रौंदा जाता है।
मुझे आशा है कि पर्चे को मननशील मुसलमानों का समर्थन प्राप्त नहीं है।
उन्हें इसे पढ़कर यह अनुभव कर लेना चाहिए कि ऐसे पर्चे कितना उत्पात पैदा
कर सकते हैं।
मेरे संवाददाता ने मुझसे पूछा है कि इस उपद्रव का कैसे सामना करना
चाहिए। एक उपचार का प्रयोग मैंने किया है, यानी इसके निंदात्मक प्रचार को
जिम्मेदार मुस्लिम जगत के ध्यान में लाया जाए। वह स्वयं प्रकाशन के प्रति
स्थानीय मुसलमान नेताओं का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। दूसरा तथा सर्वाधिक
महत्वपूर्ण कार्य आंतरिक शुद्धि का है। जब तक हिंदू समाज में अस्पृश्यता की
स्थिति बनी रहती है, उस पर बाहर से हमले होने की संभावना बनी रहेगी। ऐसे
हमलो को वह तभी रोक सकेगा, जब अस्पृश्यता के पूर्ण उन्मूलन के रूप में
शुद्धि की एक ठोस तथा अमेद्य दीवार खड़ी कर दी जाए।
पहले विरोध की उग्रता तथा दूसरे की विनम्रता काफी स्पष्ट है। निश्चय ही
गांधी को एक चालाक ‘पक्षपाती’ मानना पड़ेगा।
लेकिन मुस्लिम तथा ईसाई प्रचार के प्रति उनके दृष्टिकोण में इस भेदभाव के अलावा ईसाई मिशनों के विरुद्ध श्री गांधी के तर्कों में क्या कोई वैधता है? उनमें निरा चातुर्य है। उनमें कोई गहराई नहीं है। वे एक बेबस व्यक्ति के घोर निराशाभरे तर्क हैं। श्री गांधी शुरूआत ही समान सहिष्णुता और समान श्रद्धा के बीच विभेद से करते हैं। ‘समान श्रद्धा’ एक नई अभिव्यक्ति है। यह समझ पाना कठिन है कि उसके द्वारा वह क्या विभेद करना चाहते हैं। लेकिन नई अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है। पुरानी अभिव्यक्ति ‘समान सहिष्णुता’ गलती की गुंजाइश दर्शाती है। दूसरी ओर, ‘समान श्रद्धा’ मानती है कि सभी धर्म समान रूप से सच्चे और समान महत्व के हैं। यदि मैंने उन्हें ठीक से परखा है तो उनका आधार-वाक्य न केवल तर्क की, बल्कि इतिहास की दृष्टि से भी नितांत भ्रामक है। मान लीजिए कि धर्म का लक्ष्य प्रभु तक पहुंचना है, और मैं नहीं मानता कि वह लक्ष्य है और धर्म उस तक पहुंचने का मार्ग है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि हर धर्म निश्चय ही प्रभु तक ले जाएगा। न ही यह कहा जा सकता है कि हर मार्ग, भले ही वह अंततः प्रभु तक ले जाता हो, सही मार्ग है। हो सकता है कि (सभी विद्यमान धर्म झूठे हों) और सर्वांगपूर्ण धर्म का अभी तक पता न चला हो। लेकिन तथ्य यह है कि धर्म पूर्णतः सत्य नहीं है। अतः एक धर्म के अनुयायियों को अधिकार है, वस्तुतः