धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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उनका कर्तव्य है कि वे अपने भटके मित्रों को बता दें कि उनकी दृष्टि में सत्य क्या है। अस्पृश्य की स्थिति गाय से बेहतर नहीं है, यह एक ऐसा कथन है जिसे कहने का दुस्साहस केवल कोई विवेकशून्य अथवा अहंकारी व्यक्ति ही कर सकता है। यह कोरी बकवास है। श्री गांधी यह कहने का दुस्साहन करते हैं क्योंकि वह स्वयं को ऐसा महापुरुष मानने लगे हैं कि अज्ञानी जनता उनके कथनों पर आपत्ति नहीं करेगी ओर बेईमान बुद्धिजीवी वर्ग उनकी हर बात का समर्थन करेगा। उनके तर्क की सर्वाधिक विचित्र बात यह है कि वह ईसाई मिशनों द्वारा जुटाई जाने वाली भौतिक संपदा को ग्रहण करना चाहते हैं। वह उनकी आध्यात्मिक संपदा को ग्रहण करना चाहते हैं, पर उनकी शर्त ह कि मिशनरी उन्हें ‘बिना किसी बंधन के’ भौतिक संपदा ग्रहण करने का न्यौता दें। (वह प्रतिदिन के खिलाफ हैं)। यह समझ पाना कठिन है कि किस कारण श्री गांधी कहते हैं कि मिशनरियो की सेवाएं प्रलोभन हैं और धर्म-परिवर्तन सुविधा का लालच देने वाला धर्म-परिवर्तन है। क्यों इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता कि मिशनरियो की ये सेवाएं दर्शाती हैं कि ईसाइयों की दृष्टि में पीडि़त मानवता की सेवा करना उनके धर्म की अनिवार्य अपेक्षा है? जिस प्रक्रिया के द्वारा किसी व्यक्ति को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित किया जाता है, उसके प्रति क्या यह गलत दृष्टिकोण होगा? यह गलत है, ऐसा केवल पूर्वाग्रही ही कहेगा।
श्री गांधी के ये सभी तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं, ताकि ईसाई मिशनरी अस्पृश्यों को ईसाई न बना सकें। कोई भी इस बात का खंडन नहीं करेगा कि श्री गांधी को अधिकार है कि वह हिंदू धर्म के हित में अस्पृश्यों की रक्षा करें। लेकिन उस अवस्थ में उन्हें दो-टूक शब्दों में मिशनां से यह कह देना चाहिए था, ‘अपना काम रोक दो, अब हम अस्पृश्यों की तथा अपनी रक्षा करना चाहते हैं। हमें अवसर दो।’ खेद है कि उन्होंने मिशनरियों के उत्पात का सामना करने के लिए ईमानदारी का यह तरीका नहीं अपनाया। कोई कुछ भी कहे, पर निश्चय ही सभी अस्पृश्य, चाहे उन्होंने धर्म बदला हो य न बदला हो, इस बारे में सहमत होंगे कि श्री गांधी ने ईसाई मिशनों के प्रति घोर अन्याय किया है। सदियों तक ईसाई मिशनों ने उन्हें यदि शरण नहीं, आश्रय तो दिया ही है।
जरूरी नहीं कि श्री गांधी का यह रवैया भय दिखाकर मिशनरियों अथवा अस्पृश्यों को रोक सके। ईसाई धर्म भारत में अपनी जड़ें जमा चुका है। यदि उसे दबाने के लिए हिंदू राष्ट्रवाद के उन्माद में अपनी राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक शक्ति का दुरुपयोग नहीं करेंगे, तो वह जिंदा रहेगा और सदा ही उसकी संख्या और प्रभाव में वृद्धि होती रहेगी।