16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 396

धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति

II. ईसाई शिक्षा-व्यवस्था ख्1,

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संस्थाएं छात्र

  1. प्रारंभिक स्कूल 13,330 611,730

  2. माध्यमिक स्कूल 302 67,229

  3. कालिज 31 11,162

  4. धर्म-विज्ञान कालिज और ट्रेनिंग स्कूल 25 556

  5. बाइबिल ट्रेनिंग स्कूल 74 2,855

  6. टीचर ट्रेनिंग स्कूल 63 3,185

इसकी तुलना में हिंदुओं के पास दिखाने के लिए क्या है? ऐतिहासिक दृष्टि से कहा जाए तो हिंदू धर्म तथा हिंदुओं का मानवता की सेवा से कोई नाता नहीं है। हिंदू धर्म में कर्मकांड और रीति-रिवाजों की प्रधानता है। वह मंदिरों का धर्म है। मानव-प्रेम के लिए उसमें कोई स्थान नहीं है। मानव-प्रेम के बिना मानव-सेवा की प्रेरणा कैसे मिल सकती है? हिंदुओं के परोपकार-कार्यों के लिए जिन प्रयोजनों से दानादि किया जाता है, उनमें यह बात भली-भांति स्पष्ट हो जाती है। भारत में केवल इने-गिने लोग ही जानते हैं कि किस हद तक हिंदुओं के दानादि के प्रयोजन और परिधि का निर्धारण जाति करती है। हिंदुओं के दान कार्यों के बारे में पूर्ण तथा सही तथ्य प्राप्त करना कठिन है। लेकिन कुछ वर्ष पूर्व बंबई नगर में आंकड़े एकत्र किए गए थे। वे इस विषय पर प्रचुर प्रकाश डालते हैं। (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में आंकड़े टंकित नहीं किए गए µ संपादक)।

सन् 1918 में बंबई में एन्फलुएंजा की महामारी के दौरान कतिपय डाक्टरों पर आरोप लगाया गया था कि रोगी के उपचार पर जातिवाद का प्रभाव पड़ सकता है।

तुलनात्मक दृष्टि से कहा जाए तो समाज-सेवा के क्षेत्र में ईसाई मिशनों की उपलब्धियां अति महान हैं। इसके बारे में संदेह तो केवल वही कर सकता है, जिसने ईसाई धर्म की हर चीज का विरोध करने की कसम खा ली हो। इन सेवाओं को स्वीकार करते समय हम दो प्रश्न उठा सकते हैं। क्या भारत के ईसाई संप्रदाय को इन सेवाओं की जरूरत है? क्या भारत के ईसाई संप्रदाय की कोई ऐसी जरूरतें हैं, जिनकी ओर मिशनरियों ने ध्यान नहीं दिया है?

यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि भारत के ईसाई मुख्यतः अस्पृश्यों और गौणतः निम्न श्रेणी की शूद्र जातियों में से बने हैं। अतः निश्चय ही मिशनों की समाज-सेवाओं को इन वर्गों की जरूरतों की दृष्टि से आंकना होगा। वे जरूरतें क्या हैं?

  1. भारत में।