16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 397

382 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शिक्षा तथा चिकित्सा-सहायता के क्षेत्रों में मिशनों ने जो सेवाएं की हैं, वे भारत के ईसाइयों की पहुंच से बाहर हैं। अधिकांशतः उनका लाभ सवर्ण हिंदुओं को मिलता है। भारत के ईसाई या तो इतने गरीब होते हैं या फिर उनमें इतना उत्साह होता ही नहीं कि वे उच्च शिक्षा के लिए प्रयास करें। अतः मिशन हाई स्कूलों, कालिजों और होस्टलों को चलाने के लिए जो पैसा खर्च कर रहे हैं, वह भारतीय ईसाइयों के उत्थान की दृष्टि से पैसे का दुरुपयोग तथा अपव्यय है। उसी प्रकार ईसाइयों द्वारा दी गई अधिकांश चिकित्सा-सहायता भी सवर्ण हिंदुओं को मिलती है। अस्पतालों के बारे में तो खास तौर पर ऐसा कहा जा सकता है।

मुझे मालूम है कि अनेक मिशनरी इस बात को अनुभव करते हैं। फिर भी यह खर्च वर्ष-प्रतिवर्ष किया जा रहा है। निश्चय ही इन सेवाओं का उद्देश्य है कि ईसाई मिशनरियों और सवर्ण हिंदुओं को आपस में संपर्क स्थापित करने का अवसर मिल सके। मेरा विचार है कि अब समय आ गया है कि मिशनरी यह अनुभव करें कि सवर्ण हिंदुओं को ईसाई बना लिया जाएगा, इस आशा से उनके पीछे लगने का प्रयास एक निरर्थक प्रयास है और निश्चय ही उसमें पूर्ण विफलता ही हाथ लगेगी। मेरे विचार में श्री विन्स्लो ने ठीक ही कहा है। ईसाई धर्म के प्रति भारत के बुद्धिजीवी वर्ग के रवैए के बारे में अपने सर्वेक्षण का समापन करते हुए वह कहते हैंः

.... जहां डफ और सेरामपोर मिशनरियों के कार्य के फलस्वरूप कुछ

उल्लेखनीय धर्म-परिवर्तन हुए और कुछ समय के लिए ऐसा लगा मानों

अंग्रेजी शिक्षा के कारण उसे ग्रहण करने वालों में से अनेक लोग तेजी से

ईसाई चर्च के प्रांगण में आ जाएंगे, पर शीघ्र ही एक प्रतिक्रिया प्रारंभ हो गई

और आंदोलन ठप्प हो गया। उसका स्थान आस्तिक समाजियों ने, विशेषतः

बंगाल के ब्राह्मो समाज ने ले लिया। जो हिंदू पश्चिमी विचारधारा के प्रभाव

में आकर मूर्तिपूजा और जातिप्रथा से खीज उठे थे, उन्हें ब्राह्मो समाज ने

इस योग्य बनाया कि वे मूर्तिपूजा और जातिप्रथा को तो छोड़ दें, पर हिंदू

वर्ण-व्यवस्था के भीतर अपने स्थान का पूर्ण परित्याग न करें। अनेक वर्षों

तक ईसाई मिशनरी यह आशा और विश्वास करते रहे कि ब्राह्मो समाज ईसाई

धर्म के लिए आधी मंजिल सिद्ध होगा और उसके अनेक सदस्य कालक्रम में

त्रिशंकु जैसी स्थिति से खीज उठेंगे और ईसाई धर्म को अंगीकर कर लेंगे,

लेकिन यह आशा मुख्यतः निराशा ही सिद्ध हुई, भले ही कुछ उल्लेखनीय

धर्मान्तरित समाजियों में से आए हैं।....

तो आज का शिक्षित भारतीय, विशेषतः ब्राह्मण, यीशु के बारे में क्या सोचता