धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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है? संभवतः साधारणीकरण करने का प्रयास करना तो बेवकूफी ही होगी।... फिर
भी कुछ मोटी-मोटी बातें सामने हैं और उनका निरापद रूप से वर्णन किया जा
सकता है। .... यीशु के उपदेश, खासकर उनके नैतिक उपदेश के मुख्य सिद्धांतों
को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। इसे आम तौर पर स्वीकार किया
जाएगा कि ‘पर्वत-प्रवचन’ (सर्मन आन दि माउंट), जहां यह जरूरी नहीं कि
उसमें ऐसी बात हो जिसकी तुलना अन्य स्रोतों से न ही जा सके, वहां वह
मानव-आचरण की निर्देशिका के रूप में लाजवाब है। ... यीशु के उपदेश की
इस व्यापक स्वीकृति के साथ-साथ उनके जीवन और चरित्र के प्रति भी आम
तौर पर गहन श्रद्धा है।...
दूसरी ओर, यह दावा किया जाता है कि एक ‘विलक्षण’ अर्थ में यीशु दिव्य
थे और हैं। पर इस दावे को अधिकांश हिंदू तथा वे हिंदू भी जो उनके जीवन
के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं, स्वीकार करने को तैयार नहीं होंगे। .... (वे) उनके
साथ-साथ (अपने) महान भविष्यदृष्टा बुद्ध को भी मुकाबिले में खड़ा करेंगे।
लेकिन ईसाइयों का यह दावा (वे) स्वीकार नहीं करेंगे कि ‘वे ही’ और केवल
‘वे ही’ ‘देहधारी प्रभु’ हैं और ‘उनके’ और केवल ‘उनके’ प्रति श्रद्धा रखने से
ही उद्धार हो सकेगा। हिंदुओं की दृष्टि में यह केवल विशिष्ट और संकीर्ण है।
... इस प्रकार उद्धार के एकमात्र पथ का ईसाइयों का दावा भारत में नैसर्गिक
घृणा पैदा करता है। .... शिक्षित हिंदू का अजीबोगरीब धार्मिक दृष्टिकोण आज
भी यह है कि वह हिंदू बने रहने में पूर्ण संतोष अनुभव करता है, भले ही वह
यीशु के प्रति गहरी श्रद्धा रखता है और ‘उनके’ उपदेश के मुख्य सिद्धांतों को
स्वीकार करता है।
इसमें संदेह नहीं कि यह स्थिति का सही आकलन है। यदि ऐसा है, तो शिक्षा तथा चिकित्सा-सहायता पर ईसाई मिशनों ने जो धन तथा शक्ति खर्च की है, वह उनका सदुपयोग नहीं है और उससे भारत के ईसाइयों को मदद नहीं मिलती।
भारत के ईसाइयों की दो जरूरतें हैं। एक तो यह है कि उनके नागरिक अधिकारों की रक्षा की जाए। दूसरी यह है कि उनके आर्थिक उत्थान के साधन और उपाय जुटाए जाएं। मैं यहां इन जरूरतों पर ब्यौरेवार चर्चा नहीं करूंगा। मैं तो केवल यह बताना चाहता हूं कि ईसाई मिशन भारत में जो सामाजिक कार्य कर रहे हैं, उसमें यह एक भारी कमी है।