384 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
III
ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा और चिकित्सा-सहायता के क्षेत्र में जो कार्य किया है, जहां तक वह अति उल्लेखनीय और प्रशंसनीय है, वहां अब भी एक प्रश्न है, जिसका उत्तर दिया जाना है, धर्मान्तरित की मानसिकता को बदलने की दिशा में ईसाई धर्म ने क्या हासिल किया है? क्या धर्मान्तरित अस्पृश्य का दर्जा बढ़ाकर ‘स्पृश्य’ का हो गया है? क्या धर्मान्तरित स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों ने जात-पांत को तज दिया है? क्या उन्होंने अपने पुराने गैर-ईसाई देवी-देवताओं को पूजना छोड़ दिया है और क्या उन्होंने अपने पुराने गैर-ईसाई अंधविश्वासों को छोड़ दिया है? ये दूरगामी प्रभाव वाले प्रश्न हैं। उनका उत्तर दिया ही जाना चाहिए और इन प्रश्नों के जो उत्तर ईसाई धर्म दे सकता है, उन्हीं पर ईसाई-धर्म को भारत में टिकना अथवा गिरना होगा। दक्षिण भारत के दलित ईसाई वर्गों ने साइमन कमीशन को जो ज्ञापन दिया था, उससे निम्न उद्धरण दिए गए हैं। जहां तक जात-पांत के प्रश्न का संबंध है, ये उद्धरण ईसाई धर्म में शामिल होने वाले अस्पृश्यों की स्थिति पर प्रचुर प्रकाश डालते हैंः
हमनें ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया है। हम रोमन कैथोलिक भी हैं और
प्रोटेस्टैंट भी। प्रेसिडेंसी के भारतीय ईसाइयों की कुल संख्या में से कोई साठ प्रतिशत
लोग दलित वर्गों से धर्मान्तरित किए गए हैं। जब हमारे प्रदेशों में ईसाई धर्म का
प्रचार किया गया तो हमने, यानी पाल्लाओं, पेरियाओं, मल्लाओं, मादिगाओं आदि
ने ईसाई धर्म को अंगीकर कर लिया। लेकिन हमारे वंश और मूल के अन्य लोगों
ने धर्म-परिवर्तन नहीं किया और वे हिंद दलित वर्ग कहलाते हैं। वे सब हिंदू हैं
या हिंदू धर्म के अनुयायी हैं। लेकिन इसके बावजूद कि हमारा ईसाई धर्म हमें
मूल सत्यों की सीख देता है, जैसे प्रभु के समक्ष मानव मात्र की समता, पड़ोसी
के प्रति उपकार और प्रेम की जरूरत, परस्पर सहानुभूति और सहिष्णुता की
जरूरत, हम दलित वर्ग के धर्मान्तरितों में से अधिकांश की सामाजिक स्थिति हिंदू
दलित वर्गों जैसी ही है। अनेक कारणों से, जिनमें से अधिक महत्वपूर्ण है ईसाई
धर्म ग्रहण करने वालों की कट्टर जातिवाद की हिंदू मनोवृत्ति और मिशनरियों
की उदासीनता, उपेक्षा और लाचारी के कारण हमारी स्थिति आज भी वैसी ही
है, जैसी कि ईसाई बनने से पूर्व थी। हम आज भी अस्पृश्य हैं। देश में प्रचलित
सामाजिक स्थिति संबंधी नियम हमारा तिरस्कार करते हैं, सवर्ण ईसाई हमें ठुकराते
हैं और सवर्ण हिंदू हमसे घृणा करते हैं तथा हिंदू दलित वर्ग के हमारे अपने ही
बंधु हमारा बहिष्कार करते हैं।
दक्षिण भारत के ईसाइयों के जिस छोटे से वर्ग के प्रतिनिधि मद्रास में विधान
परिषद् में विराजमान हैं, वे सवर्ण ईसाई हैं। सवर्ण ईसाई शब्द विरोधाभास पैदा