16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 400

धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति

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करता है, लेकिन दुर्भाग्य से हिंदू धर्म से आए उच्च जाति के धर्मान्तरितों के बारे में यह सही तथा मान्य अभिव्यक्ति है। उनमें जातिवाद की कठोरता और विशिष्टता अब भी बनी हुइ है। खास तौर पर मुफस्सिल इलाकों और ग्रामों में, जिन लोगों को हमारे ईसाई भाई होना चाहिए था, वे ही जातीय बहिष्कार की कठोर तथा अन्यायपूर्ण परंपरा का पालन करते हैं। वे हमें ‘पंचम अथवा पेरिया’ कहकर हमारी निंदा करते हैं। वे हमारे ईसाई अधिकारों की अवहेलना करते हैं। वे अपनी समृद्धि, शक्ति, प्रतिष्ठा और मान के मद में मस्त होकर यह निरीह ईसाइयों को समाज से बहिष्कृत करते हैं। ... पंचम-विरोधी गतिविधियों के विस्फोट प्रायः होते रहते हैं। दक्षिण भारत का ईसाई समाज इसके लिए बदनाम है। अपनी दशा सुधारने के लिए, अपनी प्रगति के लिए और अपने प्राथमिक अधिकारों पर आग्रह करने के लिए जब हम हल्का-सा भी प्रयास करते हैं तो हमें हर व्यक्ति के क्रोध और कोप का शिकार होना पड़ता है। फिर चाहे वह अधिकारी हो या न हो, ईसाई हो अथवा हिंदू, वे सबके सब जनम की मूर्खतापूर्ण श्रेष्ठता का दंभ करते हैं। ईसाई धम के मूल सिद्धांतों को नकारते हुए तथा प्रेम, उपकार और भाईचारे की भावना को ठुकराते हुए हमारे ‘ईसाई भाई’ गिरजाघरों में भी हमारे साथ अस्पृश्यों तथा सामीप्यवर्जितों जैसा व्यवहार करते हैं। वे हमारे लिए अपने परिसरों से दूर अलग स्थान की व्यवस्था करते हैं और अपने हिस्सों में लोहे की छड़ों और दीवारों तथा बाड़ों द्वारा अवरोध

खड़े करते हैं। ऐसे अनेक गिरजाघर हैं।

शपथ-ग्रहण के मामले में भ्रष्टता से बचने के लिए अति उपहासास्पद अलगाव किया जाता है। अपने बच्चों को शिक्षा देने और उन्हें जीवन संग्राम के लिए तैयार करने के हमारे दावो को नृशंसता से ठुकराया जाता है। नितांत पूर्वाग्रह के कारण हमारे बच्चों को स्कलों, शिक्षालयों छात्रावासों, होस्टलों में प्रवेश नहीं दिया जाता और यदि दिया भी जाता है, तो उनके लिए अलग अपमानजनक स्थान की व्यवस्था की जाती है। सवर्ण ईसाई स्वयं को सवर्ण हिंदुओं के पूर्वजों का वंशज जताते हुए सामाजिक दर्जे और प्रतिष्ठा की याचना करता है और अपने सजातीयों, यानी हिंदुओं की सहानुभूति प्राप्त करता है। वह दलित वर्ग के ईसाइयों से वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा कि सवर्ण हिंदू लोग हिंदू दलित वर्गों के साथ करते हैं।

जिस बात को यहां सामान्य शब्दों में कहा गया है, उसे मैं नीचे दी गई दो घटनाओं द्वारा मूर्तरूप देना चाहूंगा। (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में घटनाओं का उल्लेख नहीं किया गया है µ संपादक)।