386 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह एक भयंकर आरोप-पत्र है। यह जानकर राहत मिलेगी कि वह न तो समूचे भारत पर लागू होता है और न ही सभी प्रकार के ईसाइयों पर। प्रोटेस्टैंटों की तुलना में वह कैथोलिकों के बारे में अधिक सही तस्वीर है। उत्तर भारत अथवा मध्य भारत की तुलना में वह दक्षिण भारत के बारे में ज्यादा सही है। लेकिन फिर भी तथ्य यह है कि ईसाई धर्म को ग्रहण करने वालों के मन से जातिवाद की भावना को दूर करने में ईसाई धर्म विफल रहा है। स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों के बीच विभेद को किसी कोने में रखा जा सकता है। चर्च का स्कूल सभी के लिए खुला हो सकता है। फिर भी इस बात को चुनौती नहीं दी जा सकती कि जातिवाद ईसाइयों के जीवन पर भी उतना ही छाया हुआ है, जितना कि हिंदुओं के जीवन पर। ब्राह्मण ईसाई भी हैं और गैर-ब्राह्मण ईसाई भी। गैर-ब्राह्मण ईसाइयों में मराठा ईसाई, महार ईसाई, मांग ईसाई, और भंगी ईसाई हैं। उसी प्रकार दक्षिण में पेरिया ईसाई, मल्ला ईसाई, और मादिग ईसाई हैं। उनमें आपस में रोटी व बेटी का व्यवहार नहीं चलता। हिंदुओं की भांति वे भी जातिवाद से ग्रस्त हैं।
एक और बात दर्शाती है कि धर्म-परिवर्तन करने वालों के मन से मूर्तिपजा को निकालने में ईसाई धर्म प्रभावकारी सिद्ध नहीं हुआ है। लगभग सभी धर्मान्तरित ईसाई पूजा-अर्चना की हिंदू पद्धतियों को अपनाए हुए हैं और वे हिंदुओं के अंधविश्वासों को मानते हैं। देखा जाता है कि धर्मान्तरित ईसाई अपने परिवार के देवताओं के साथ-साथ, राम, कृष्ण, शंकर, विष्णु आदि हिंदू देवताओं की भी पूजा करता है। देखा जाता है कि धर्मान्तरित ईसाई हिंदुओं के पवित्र तीथस्थलों पर जाता है। वह पंढरपुर जाकर विठोबा की अर्चना करता है। वह जेजुरी जाकर रक्तपिपासु देवता
खंडोबा को बकरे की बलि देता है। गणेश चतुर्थी को वह चंद्रमा के दर्शन नहीं करेगा। सूर्य-ग्रहण पर वह समुद्र में स्नान करेगा। ये सब अंधविश्वास हिंदुओं के हैं। कौन नहीं जानता कि जन्म, मृत्यु और विवाह के अवसर पर ईसाई हिंदुओं की सामाजिक प्रथाओं का पालन करते हैं। ईसाइयों में हिंदुओं की सामाजिक प्रथाओं के प्रचलन के बारे में मैं कुछ नहीं कहता। जहां तक इन सामाजिक प्रथाओं का कोई धार्मिक महत्व नहीं है, उनसे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन धार्मिक प्रिाओं के बारे में वैसा नहीं कहा जा सकता। ईसाइयों की आस्था और उनकी जीवन-शैली से उनका कोई मेल नहीं खाता। प्रश्न यह है कि क्या कारण है कि ईसाई धर्म उन्हें निर्मूल नहीं कर सका?
उत्तर है कि भले ही ईसाई मिशनरी लोगों को ईसाई धर्म में शामिल करने के लिए आतुर रहे हैं, पर उन्होंने धर्मान्तरित के मन में मूर्तिपूजा को उखाड़ने के लिए कोई दृढ़ प्रयास नहीं किया। वास्तविकता तो यह है कि उन्होंने उसे सहन किया है।