धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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ईसाई धर्म को ग्रहण करने वालों में मूर्तिपूजा की परंपरा बनी रही, यह उन जेसुइट मिशनों की विरासत है, जो आधुनिक-काल में धर्मान्तरण के अखाड़े में सबसे पहले उतरे। मूर्तिपूजा के प्रति कैथोलिक मिशन का रवैया मदुरा मिशन द्वारा अपनाए गए रवैए, साधनों व उपायों की उपज है। इस मिशन की स्थापना इतालवी जेसुइट पादरी राबर्ट डि नोबिली ने की थी। वह 1608 में भारत आए थे। जब उन्हें फ्रांसिस जेवियर की विफलता के बारे में पता चला तो उन्होंने एक नई तरकीब निकाली। उन्होंने धर्मदूत पौल के चरण-चिर्िंं पर चलने का निश्चय किया, जिनका कहना था कि वह जो कुछ भी बचा पाएंगे, वह सबका सब सभी लोगों में बांट देंगे। इस आस्था से प्रेरित होकर वह मदुरा के राजा फेरुमल नाइक के दरबार में गए और उन्होंने मदुरा मिशन की स्थापना की। जिस ढंग से उन्होंने शुरुआत की, उसका विस्तृत वर्णन डॉ. जे.एन. ओगिलवी ने अपनी पुस्तक ‘एपोसिल्स ऑफ इंडिया’ के निम्न उद्धरण में किया गया हैः
एक दिन समूचे मदुरा में एक सनसनी-भरा समाचार फैल गया। कहा गया कि
किसी दूर देश से एक अनोखे तपस्वी पधारे हैं। उन्हें इस पावन नगरी की महान
ख्याति ने आकर्षित किया है और उन्होंने अपना आसन नगरी के ब्राह्मण-क्षेत्र में
जमाया है। शीघ्र ही दर्शकों के झुंड परिवत्रात्मा के दर्शन के लिए उनके निवास
पर जमा हो गए, लेकिन उन्होंने देखा कि ब्राह्मण के सेवक उन्हें प्रवेश नहीं
करने दे रहे थे। उन्होंने कहा, ‘स्वामी, प्रभु के चिंतन में लीन हैं। उसमे बाधा न
डाली जाए।’ इससे तो लोगों की उत्कंठा और भी तीव्र हो गई और एकांतवासी
की ख्याति में चार चांद लग गए। फिर एकांतवास में ढील दी गई और प्रतिदिन
चंद भाग्यशाली लोगों को दर्शन की अनुमति दी गई।
दर्शनार्थियों ने देखा कि पद्मासन में सोफे पर बैठके संन्यासी का हर आचरण
ब्राह्मण जैसा था। उनके कंधे पर पांच धागों वाला जनेऊ शोभायमान था। त्रित्व
के प्रतीक के रूप में तीन धागे सोने के थे और हमारे प्रभु की देह और आत्मा
के प्रतीक के रूप मे दो धागे चांदी के थे। जनेऊ में छोटा-सा ‘क्रास’ लटका
हुआ था। वार्ता से पता चला कि संन्यासी ज्ञानी थे। देखने और सुनने से पता
चला कि वह अल्पाहारी और पवित्र आत्मा थे। प्रतिदिन वह केवल एक बार
भोजन करते थे ओर वह भी थोड़े से भात, दूध और खट्टे शाकों के रूप में।
शीघ्र ही उनके दर्शनार्थ न केवल सामान्य ब्राह्मण आए, अपितु कुलीन लोग भी
आने लगे। उनकी ख्याति तो उस समय आकाश को छूने लगी, जब राजमहल
से आए राजा के निमंत्रण को उन्होंने इसलिए ठुकरा दिया कि कहीं ऐसा न हो
कि वहां जाने पर किसी महिला पर उनकी दृष्टि पड़ जाए और उनकी आत्मा
की पवित्रता कलुषित हो जाए। मदुरा में उनसे अधिक पवित्र संत कभी नहीं