388 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
देखा गया। जहां उनका जीवन उनकी पवित्रता का ऐसा प्रमाण दे रहा था, वहां उनका प्रवयन भी असत्य कैसे हो सकता था। उनके इस कथन को स्वीकार कर लिया गया, ‘मैं सर्वोच्च जाति का रोमन ब्राह्मण हूं।’ बचे-खुचे संदेह के निवारण के लिए एक अति प्राचीन बदरंग चर्म-पत्र प्रस्तुत किया गया। उसमें दर्शाया गया था कि किस प्रकार ‘रोम के ब्राह्मणों’ की उत्पत्ति सीधे ‘ब्रह्मा’ देव से हुई थी और उनके वंशजों में वे सर्वाधिक कुलीन थे। दस्तावेज की सत्यता के बारे में संन्यासी ने अति गंभीरता से शपथ ली और लोगों ने उनके प्रवचन को खुले दिल से सुना।
योग्य तथा निर्भीक लेखक ने ढेर सारी पुस्तकों की रचना कर डाली। उनमें उन्होंने हिंदू रूपी तने में संशोधित मसीही सिद्धांत की कलम बांधी। इन सभी प्रयासों में सर्वाधिक उल्लेखनीय था, ‘पंचम वेद’ की रचना। उसका उद्देश्य था कि ब्राह्मणों की दृष्टि में अपौरुषेय चार वेदों को पूर्णता और प्रखरता प्रदान की जाए। यह दुस्साहस की पराकाष्ठा थी। इसमें वैसा ही खतरा था, जैसा कि किसी हिंदू के लिए होता, यदि वह किसी ‘पांचवीं बाइबिल’ की रचना मसीहियों के लिए कर डालता। फिर भी यह जानसाजी डेढ़ सौ वर्षों तक टिकी रही।
शीघ्र की बिना रोकटोक के ब्राह्मणों को चेला बना लिया गया। ईसाई धर्म की दीक्षा लेने वालों की संख्या दूनी-चौगुनी होती गई, भले ही पूर्ववर्ती यूरोपीय मिशनरियों द्वारा अपनाई गई दीक्षा-संस्कार की रीति का रूप बदल दिया गया। जहां तक बाह्य प्रतीकों का संबंध था, नई मिशनरी-पद्धति सफल सिद्ध हो रही थी। इसमें संदेह नहीं कि इस प्रगति में हिंदू धर्म को दी गई अति महत्वपूर्ण रियायतों, विशेषतः जाति संबंधी रियायत का भारी हाथ था। डि नोबिली के अनुसार, जाति का कोई महत्व नहीं था। उनकी दृष्टि में वह मुख्यतः एक सामाजिक प्रथा थी। उन्हें इस बारे में इसका कोई कारण नहीं दीख पड़ा कि वे अपने धर्मान्तरितों को इस बात के लिए विवश करें कि वे अपने जातीय भाईचारे या प्रथाओं को छोड़ दें। उनके धर्मान्तरित सवर्ण हिंदू के चिर्िं के रूप में शेन्डी अथवा चोटी रखते थे। वे अपने हिंदू पड़ोसियों जैसा ही जनेऊ धारण करते थे। वे अपने ललाट पर अंडाकार टीका जातीय चिर्िं के रूप में लगाते थे। वह घिसे हुए चंदन का या चंदन की भस्म का होता था। अब फर्क इतना था कि पहले वह गाय के गोबर के उपले की भस्म का होता था।
चालीस वर्षों तक डि नोबिनी ने ऐसा जीवन जिया। वह जीवन दैनिक कष्ट, त्याग और स्वेच्छा से अपनाई गई विनम्रता से भरपूर था। वह विरल जीवन था।