धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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16 फरवरी, 1656 को उनका निधन हो गया। वह अस्सी वर्ष के थे। उन्हें श्रेय है कि उन्होंने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई एक लाख लोगों को अपने धर्म में शामिल किया। यदि अतिश्योक्ति का अवसर दिया जाता तो उनकी संख्या अति विशाल होती।
सन् 1673 में जॉन डि ब्रिट्टो जलपोत द्वारा भारत आए। उनका परिवार पुर्तगाल के सर्वाधिक संभ्रान्त परिवारों में से है। वह अब रोमन कैथोलिक चर्च के संत हैं। हमारे ही जमाने के लंदन मिशनरी सोसाइटी के विलियम रौबिन्सन ने उनके बारे में कहा है, ‘वह एक निडर, निस्स्वार्थ शिष्य हैं। उनमें वे सभी महान गुण हैं, जो ईसाई-जीवन के ओज में वृद्धि करते हैं। उनकी यह निर्विवाद ख्याति है।’
मदुरा राज्य के विघटन और छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना के बाद उन्हें तथा ईसाई धर्मान्तरितों को निर्ममता से सताया गया।
फिर भी शत्रुओं के अड़ंगों के बावजूद यह कार्यकर्ता अपने व्रत का पालन करता रहा और जहां कहीं भी भी वह गया, सफलता की वही गाथा कही गई। संदेश के ओज को संदेशवाहक के ओज ने गुणित कर दिया और उनके द्वारा धर्मान्तरित लोगों की संख्या हजारों तक पहुंच गई। जब डि ब्रिट्टो ने मरावा के राजकुमार टाडिया तेवार को ईसाई धर्म में दीक्षित किया तो शीघ्र ही उनकी हत्या के प्रयास किए गए। उनका 4 फरवरी, 1693 की निर्ममता से वध कर दिया गया।
सन् 1707 में इतालवी पादरी और डि ब्रिट्टो के उत्तराधिकारी फादर जोसेफ बेस्ची भारत पहुंचे। बेस्ची ने ‘रोमन ब्राह्मणों’ की नीति का पालन किया, लेकिन उनकी मिशनरी-प्रथा अपने पूर्ववर्तियों से काफी भिन्न थी। डि नोबिली ने यथासंभव एक निष्ठावान संन्यासी, एक पवित्रात्मा गुरू का रोल अदा किया। डि ब्रिट्टो मुख्यतः घुमक्कड़ संन्यासी, पवित्रात्मा यात्री रहे। दोनों ने अपने निजी जीवन में महानतम तपस्या और सादगी को अपनाया। लेकिन फादर बेस्ची ने नई नीति अपनाई। यदि हिंदू धर्म में तपस्वी हैं, तो बड़े-बड़े पुजारी भी जो हैं, तो बड़ी तड़क-भड़क व ऐशो-आराम से रहते हैं। यह थी, बेस्ची की नीति। उनका विचार था कि तड़क-भड़क से वे लोगों को चुंधिया देंगे। वह एक शानदार पालकी में सफर करते थे। पालकी के आगे-आगे एक सेवक बैंजनी रेशम का छाता हाथ में लेकर चलता था। पालकी के दोनों ओर सेवक मोरपंख के शानदार पंखे लेकर दौड़ते थे। पालकी के भीतर एक शानदार बाघ-चर्म पर बहुमूल्य तथा नयनाभिराम वस्त्रधारी शक्तिशाली गुरु तकिए के सहारे लेटे रहते थे। लेकिन बेस्ची कोई थोथे आडंबरी नहीं थे। उन्होंने अपनी कार्यशैली लोगों की मनोवृत्ति को भली-भांति