16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 405

390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

समझकर अपनाई थी और उसका जादू अनेक लोगों पर चला। उनकी ख्याति

का आधार ये अपव्यय नहीं थे। उसका आधार था, उनकी अद्भुत विद्वता। वह

जन्मजात भाषाविद् थे। अतः उन्होंने तमिल पर इतन पूर्ण अधिकार प्राप्त कर

लिया कि वह अपने जमाने के सर्वाधिक योग्य तमिल विद्वान बन गए। कोई भी

स्थानीय तमिल विद्वान उनके जोड़ का नहीं था। चाहे ‘उच्च वर्ग’ की तमिल हो

या ‘निम्न वर्ग’ की तमिल, यानी विद्वान ब्राह्मण की तमिल हो या आम लोगों

की बोलचाल की तमिल, दोनों पर बेस्ची का बराबर का अधिकार था। फर्राटे

भरने वाली अपनी लेखनी से उन्होंने शब्दकोशों, व्याकरणों, काव्यों-कृतियों तथा

गद्य-विनिबंधो की रचना की और आज भी उन्हें बड़े आदर से पढ़ा जाता है।

जब पहले-पहल उनका प्रकाशन हुआ तो उन्होंने दक्षिण भारत के मूल निवासियों

का मन मोह लिया। वेल्लोर के नवाब चांद साहिब तो उनकी विद्वत्ता से इतने

अभिभूत हुए कि उन्होंने बेस्ची को राज्य के एक ऊंचे पद पर नियुक्त कर दिया

और उनके गुजारे के लिए उन्हें त्रिचनापल्ली जिले के चार गांव भेंट कर दिए।

इन गांवों से 12,000 रुपये की मालागुजारी आती थी। इस समूची ख्याति तथा

भौतिक समृद्धि को बेस्ची ने निष्ठा के साथ मिशन की वृद्धि और संवृद्धि पर

लगा दिया। वह मिशन की समृद्धि का स्वर्ण-काल था। लेकिन जब 1742 में

फादर बेस्ची का निधन हुआ, उसके आसपास ही मिशन का पराभव शुरू हो

गया और अंततः वह ठप्प ही हो गया।

मदुरा के ये मिशनरी इस बात के लिए आकुल रहे कि धर्मान्तरित के समक्ष ईसाई धर्म का ऐसा रूप प्रस्तुत किया जाए, जो ऐसे किसी भी पश्चिमी रीति-रिवाज से मुक्त हो, जिससे धर्मान्तरित भड़क उठें। उन्होंने रियायतों के रूप में धर्मान्तरितों के अनेक हिंदू रीति-रिवाजों को बर्दाश्त किया, जैसे जनेऊ को धारण करते रहना और ललाट पर टीका लगाते रहना, किशोरावस्था से पूर्व ही बच्चों का विवाह कर देना (बाल विवाह), कभी-कभी महिलाओं को ईसाई धर्म में ही दीक्षित करने से संबंधित धर्म-कृत्यों से बरी करना, अनुष्ठान संबंधी शुद्धि के लिए स्नान करना आदि तथा जाति के भीतर ही रोटी-बेटी का व्यवहार करना। इन्हें ‘मलाबारी धार्मिक कृत्य’ कहा जाता था। 12 सितंबर, 1744 को इन्हें पोप बेनेडिक्ट XIV द्वारा जारी किए गए सर्वहिताकांक्षी ‘आदेश-पत्र ख्1, ’ द्वारा रद्द कर दिया गया। तब से हर रोमन कैथोलिक मिशनरी को इस आदेश-पत्र का पालन करने की शपथ लेनी पड़ती है। फिर भी परंपरा बनी रही कि गैर-ईसाई रीति-रिवाज और गैर-ईसाई आस्थाएं ईसाई धर्म से बेमेल नहीं थीं।

  1. कृष्णा डिस्ट्रिक्ट मैनुअल, पृ. 282