धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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निश्चय ही 16वीं सदी में मिशनरियों के रास्ते में दो बड़े कांटे थे। एक तो यह कि बुरे यूरोपीयों ने बुरी मिसाल कायम की। दूसरा यह कि हिंदू तथा मुसलमान, दोनों ही यूरोपनीय रीति-रिवाजों को पसंद नहीं करते थे। न केवल दृष्ट यूरोपीय ही, बल्कि गोमांस खाने वाला और शराब पीने वाला निष्ठावान यूरोपीय भी ब्राह्मणों तथा मुसलमानों के सिद्धांतों को और स्थानीय पूर्वाग्रहों को ठेस पहुंचाता था। इस प्रकार ईसाई धर्म को घृणा के साथ ‘फिरंगियों’ का धर्म कहा जाता था। यूरोपीयों को तिरस्कार से फिरंगी कहा जाता था। ईसाई मिशनरियों की इन बुराईयों तथा कमजोरियों को दूर करना न केवल अति आवश्यक था, बल्कि उचित भी था। लेकिन इन जेसुइट मिशनरियों ने धर्मान्तरण के अपने उन्माद में घोर लज्जाजनक और पापाचारपूर्ण आचरण किया। उन्होंने इस बात की परवाह ही नहीं की कि धर्म-परिवर्तन करने वाला क्या सोचता है, क्या करता है और कैसे रहता है। वह तो बस ईसाई धर्म में दीक्षित होने के लिए तैयार हो जाए, यीशु को अपना मसीहा मान ले और खुद को ईसाई घोषित कर दे।
इस प्रश्न के बारे में लुथर्न मिशन का क्या रवैया था। वह भारत में मदुरा मिशन के शीघ्र पश्चात् इस क्षेत्र में आया था। भारत के महानतम मिशनरी स्वार्ट्ज मदुरा मिशन के दृष्टिकोण के समर्थक नहीं थे। अपनी धर्मनिष्ठा के कारण स्वार्ट्ज परस्पर लड़ने वाले राजाओं के बीच सुलह कराने वाले शांति-दूत बन गए थे। लेकिन क्या उनका विचार था कि जातिवाद और ईसाई धर्म दो परस्पपर विरोधी चीजें थीं? क्या उनका विचार था कि सच्चा ईसाई जातिवाद में विश्वास नहीं कर सकता था, उसे अपने जीवन की योजना बनाना तो दूर की बात थी? इस प्रश्न के प्रति उनका रवैया जो भी रहा हो, निश्चय ही उन्होंने उस दृष्टिकोण के समर्थन में अभियान नहीं चलाया।
प्रोटेस्टैंट मिशनों की क्या स्थिति थी? इस प्रश्न के प्रति उनका क्या रवैया था? यदि वे चाहें तो एक बहाना बना सकते हैं कि वे इस क्षेत्र में देरी से आए। जहां तक इतिहास का संबंध है, इस कथन में सच्चाई है कि 1813 तक उन्हें इस क्षेत्र में आने से रोका गया। इसका एकमात्र कारण वह रवैया है, जो इस मिशन के कार्य के प्रति ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के अपने राज्य-क्षेत्रों में अपनाया।
प्रारंभ में भारत आने वाली सभी यूरोपीय शक्तियों के दृष्टिकोण के पीछे भारतीयों को ईसाई धर्म में शामिल करने का भारी उत्साह था।
जहां तक पुर्तगालियों का संबंध है, ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार और अंधविश्वासों के दमन के बारे में वे निश्चय ही सर्वाधिक दृढ-संकल्प थे। विलियम बेन्टिक से पूरे तीन सौ वर्ष पूर्व 1510 में पुर्तगाली भारत में अलबुकर्क ने सती-प्रथा का दमन