16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 407

392 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया। जैसे ही निराश और हताशा फ्रांसिस जेवियर ने जबरन धर्म-परिवर्तन के लिए पुर्तगाल के जॉन तृतीय से सहायता की गुहार की, वैसे ही उन्हें सहायता दी गई। डच ईस्ट इंडीज में डच प्रशासन ने ऐसे ही उत्साह का प्रदर्शन किया और कठोर नहीं, जोरदार उपाय तो किए ही गए। 1643 में जब श्रीलंका पर डचों ने कब्जा किया, तभी से वहां ईसाई धर्म के प्रचार के लिए राज-सहायता के सिद्धांत को मान्यता प्रदान कर दी गई। मंदिरों के निर्माण और गैर-ईसाई तीर्थाटन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सरकारी पदों पर नियुक्तियां ईसाइयों के लिए आरक्षित कर दी गईं और धार्मिक स्कूलों से गैर-हाजिरी को राजद्रोह माना गया। 1685 तक 3,20,000 सिंहलियों ने इन उपायों के आगे घुटने टेक दिए। वैसे ही धार्मिक उत्साह का प्रदर्शन ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया। 1614 में कंपनी के जहाज का कप्तान एक युवा भारतीय को लंदन ले गया। कंपनी ने उसे अपने खर्चे से शिक्षा दी, ताकि वह अपने कुछ देशवासियों का धर्म-परिवर्तन कराने में सहायक हो सके। पोपालार में उसको ईसाई धर्म में दीक्षित किया गया। दीक्षा-संस्कार की रस्म में लंदन के लार्ड मेयर तथा कंपनी के डाइरेक्टर भी शामिल हुए। राजा जेम्स प्रथम ने उसका नाम पीटर चुना। जिस पादरी ने उसका दीक्षा-संस्कार किया, उसे उन्होंने श्रद्धालुओं के सामने ‘भारत के प्रथम फल’ के रूप में प्रस्तुत किया। 1617 में सूरत में एक मुसलमान का धर्म-परिवर्तन किया गया। इस प्रकार कंपनी ने अपने कार्यकाल की शुरूआत दोनों ओर के धर्मान्तरण से की। 1657 में डाइरेक्टरों ने कैंम्ब्रिज तथा आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों से आवेदन किया गया कि वे पादरी भेजें, ‘क्योंकि कंपनी ने भारत में ‘बाइबिल’ के प्रचार और प्रसार का संकल्प किया है।’ 1698 में कंपनी ने बड़ी तत्परता से अपने चार्टर में एक खंड स्वीकार कर लिया। उसके अनुसार कंपनी के पादरियों से अपेक्षा की गई कि ‘वे देशी भाषाओं को सीखने की ओर ध्यान दें, ताकि वे उन हिंदुओं को और अच्छी तरह प्रोटेस्टैंट धर्म के बारे में शिक्षा दे सकें, जो कंपनी के नौकर या उनके एजेन्ट हों।’

लगता है कि 1698 के बाद अचालक कंपनी के रवैए में महत्वपूर्ण, पर क्रमिक परिवर्तन आया। जहां पुर्तगाली और डच सरकारें पूर्ण वेग से काम कर रही थीं, वहां ईस्ट इंडिया कंपनी की गति मंद होती जा रही थी। लगता है कि उसी वर्ष कंपनी इस प्रश्न के बारे में दुविधा में फंस गई। जहां उसने यह दायित्व स्वीकार किया कि वह अपने पादरियों को भारत की देशी भाषाएं सिखाएंगे, ताकि उन्हें प्रचार का सबल साधन बनाया जा सके, वहां उसने कंपनी के लिए एक प्रार्थना तैयार किए जाने की अनुमति दी। उसमें कहा गया, ‘हम तो अपने सभी कर्मों में अपने ईसा मसीह के सिद्धांत को अपनाते हैं, अतः जिन भारतवासियों के बीच हम रहते हैं, उनके दिल को अपने शुभ कार्यों को देखते हुए जीता जाना चाहिए।’ निश्चय