16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 408

धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति

393

की 1750 तक यह प्रार्थना चलती रही। प्रार्थना के शब्दों का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर लगता है कि कहीं वह सक्रिय धर्मान्तरण के मूल विचार के पूर्ण परित्याग को खुलेआम स्वीकार तो नहीं करती। कंपनी का यह रवैया शीघ्र ही विवाद का विषय बन गया। धर्मान्तरण के समर्थक इस अवसर की ताक में थे कि कंपनी को इस रवैए को छोड़ने पर विवश किया जाए। 1773 के विनियमन अधिनियम और पिट के ईस्ट इंडिया अधिनियम ने ‘व्यापारी के भेष में राज’ की स्थिति को समाप्त कर दिया और कंपनी को भारतीय राज्य-क्षेत्रों का प्रशासन चलाने के लिए संसद का अधिकृत एजेंट बना दिया। अधिनियम में व्यवस्था की गई कि कंपनी का चार्टर केवल 20 वर्ष के लिए होना चाहिए और उसके बाद उसका नवीकरण होना चाहिए। वर्ष 1793 अत्यधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि कंपनी के चार्टर का नवीकरण उसी वर्ष में होना था।

ईसाई धर्म के प्रचार के समर्थकों को यह काम बड़ा आसान लगता था। इस काम के कर्ताधर्ता विल्बरफोर्स ने संसद के महत्वपूर्ण व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त कर लिया था। उसने आर्कबिशप मूर का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया था। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर विधेयक के प्रभारी मंत्री से समर्थन का वचन ले लिया था। इस विधेयक के पारण की भूमिका के रूप में चार्टर में शामिल किए जाने वाले मामलों को संकल्प के रूप में रखा गया, हाउस ऑफ कामन्स द्वारा पारित किया जाना था। एक संकल्प इस प्रकार थाः

ब्रिटिश विधान-मंडल का यह विशिष्ट तथा अनिवार्य कर्तव्य है कि वह सभी

न्यायोचित तथा विवेक-संगत साधनों से भारत में ब्रिटिश उपनिवेशों के निवासियों

के हित और सुख का संवर्धन करे और इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ऐसे

उपाय किए जाएं, जिनसे सामान्यतः उन्हें उत्तरोत्तर और अधिक उपयोगी ज्ञान

प्राप्त हो सके और उनका धार्मिक आदि विकास हो सके।

यह भी अधिनियमित हो कि उक्त निदेशकों के न्यायालय को एतद्द्वारा शक्ति

दी जाएगी और उससे अपेक्षा की जाएगी कि वह समय-समय पर पूर्वोक्त प्रयोजनों

को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त संख्या में ऐसे सक्षम तथा समुचित व्यक्तियों को

नियुक्त करे तथा बाहर भेजे जो स्कूल-मास्टरों, मिशनरियों आदि के रूप में कार्य

करें। पर ऐसे व्यक्ति को नियुक्ति अथवा बाहर भेजे जाने से पूर्व इन प्रयोजनों

के लिए सक्षम होने के बारे में निदेशकों के उक्त न्यायालय के सामने फिलहाल

कैंटरबरी के आर्कबिशप का अथवा लंदन के बिशप का या मसीही ज्ञान के

प्रसार के लिए लंदन की सोसाइटी का या ईसाई धर्म संबंधी ज्ञान के प्रचार के

लिए स्कॉटलैंड की सोसाइटी का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना होगा।