394 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तथा यह भी अधिनियमित हो कि निदेशकों के उक्त न्यायालय को एतद्द्वारा
शक्ति दी जाती है, और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह भारत की संबद्ध
प्रेसिडेंसियों की सरकारों को निर्देश दे कि वे सरकारें पूर्वोक्त रूप में भेजे जाने
वाले व्यक्तियों के गंतव्य स्थान को तय करें और उनके आवश्यक तथा समुचित
भरण-पोषण की व्यवस्था करें तथा वह उक्त सरकारों को यह निर्देश भी दे कि
वे अपने विवेकानुसार ऐसे अन्य उपाय सोचें और उन्हें अपनाएं, जो उन्हें पूर्वोक्त
प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सर्वाधिक अनुकूल दीख पड़ें।
अधिकांशतः डुंडओं के समर्थन से हाउस ऑफ कामन्स ने इस संकल्प को बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया। विल्बरफोर्स भाव-विभोर हो गए। अपनी पत्रिका में उन्होंने लिखा, ‘ईस्ट इंडिया के उनके मामले में इससे पहले दैव का हाथ इतना प्रत्यक्ष कभी नहीं हुआ।’ पर यह आत्म-विश्वास अधकचरा था, क्योंकि विधेयक के तीसरे वाचन के समय खंड को डुंडाओं की सहमति से निकाल दिया गया। विल्बरफोर्स ने अपने मित्र गिस्बोर्न को लिखा, ‘मेरे ख्ांड निकाल दिए गए, डुंडा परले-सिरे के झूठे और दगाबाज ।’...
यह उलट-फेर ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों ने कराई। पूर्वी भारत के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार था। कंपनी के निदेशकों के आज्ञा-पत्र के बिना कोई भी अंग्रेज भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य-क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर सकता था। यदि किसी अंग्रेज को वहां बिना आज्ञा-पत्र के पाया जाए तो उसे बाहर निकाला जा सकता था। कंपनी ने शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया कि नए खंड का असर क्या होगा। उसे पता था कि खंड के अनुसार उसे मिशनरियों की बाढ़ और उनके प्रचार के लिए भारत के द्वार खोलने होंगे। तात्कालिक प्रश्न यह था कि मिशनरियों को खुली छूट दी जाए। स्वाभाविक था कि यह अति दिलचस्प, सीखभरे तथा कटु विवाद का विषय हो गया। जो लोग उसके बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, वे ‘एडिनबरा रिव्यू’ तथा उस समय के ... पन्नों को उलट कर देख सकते हैं।
विवाद से तीन पक्ष संबद्ध थे। एक तो ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक थे। उनकी
खास दिलचस्पी उन शेयरधारियों का संरक्षण करने में थी, जो लाभांशों के लिए शोर मचा रहे थे। विवाद से जुड़ा दूसरा पक्ष था, अंग्रेजों का मध्यवर्ग। पूर्वी भारत के साथ व्यापार पर उनकी जीविका चल रही थी और उनके बेटे इन राज्य-क्षेत्रों में लाभप्रद कैरियर के लिए नए मार्ग खोज रहे थे। तीसरा पक्ष था .... वर्ष में ईसाई धर्म के प्रसार के लिए गठित चर्च मिशनरी सोसाइटी। प्रथम दो पक्षों के तो हितों का आपस में मेल बैठता था। उनका उद्देश्य साम्राज्य को बनाए रखना था। अतः वे शांति और