धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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स्थिरता चाहते थे। तीसरा पक्ष भी शांति चाहता था, पर इस बात के लिए आतुर था कि भारतीय अंधविश्वास के स्थान पर ईसाई धर्म आ जाए। प्रथम दो पक्षों ने एक शक्तिशाली गुट बना लिया और सभी शक्तियों को तीसरे का विरोध करने के लिए विवश कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उनकी जीत हुई और चर्च मिशनरी सोसाइटी की हार। विजयी पक्ष के विवाद करने वालों ने जो तर्क प्रस्तुत किए, वे निश्चय ही अति महत्वपूर्ण तथा विवाद के सर्वाधिक शिक्षाप्रद अंग हैं।
इस तर्क के बारे में कि ईसाई धर्म के पक्ष में प्रचार तुरंत शुरू होना चाहिए और यह गलत धारणा है कि भले ही सत्य पवित्र है, पर उसे थोड़ा-थोड़ा करके इस प्रकार बांटना चाहिए कि किसी प्रकार का जोखिम न उठाना पड़े, सिडनी स्मिथ ने जो उत्तर दिया है, वह स्तब्ध करने वाला है। उन्होंने कहाः
जब हम इस बात पर गौर करते हैं कि यीशु के अनेक शताब्दी पश्चात् भी
दैव से अनुमति दी कि मानव-जाति का अधिकतर भाग किसी मानवीय प्रयास
द्वारा पवित्र सत्यों का ज्ञान प्राप्त कराए जाने की संभावना बिना ही जिए और
मरे, तो हमें यह संतोष करना ही होगा कि समूचे संसार के तीव्र तथा त्वरित
धर्मान्तरण का कार्य उसके सर्वशक्तिमान नियामक की योजना का अंग है ही नहीं
और ‘उसकी’ दृष्टि में यह कोई अपराध नहीं हो सकता, यदि हम अपने घरेलू
कर्तव्यों को न तजें और धर्मान्तरण के अपने प्रयास से अपने लाखों देशवासियों
के जीवन और सांसारिक सुख को खतरे में न डालें।
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निदेशक न तो शेयरधारियों के और न ही ब्रिटिश राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य
का पालन करेंगे, यदि वे घुमक्कड़ ठठेरों को अनुमति देंगे कि ‘वे स्थानीय निवासियों
को बगावत का उपदेश दें ... स्थानीय निवासियों को निश्चय ही किसी समय इस
प्रकार से बेहतर धर्म की शिक्षा देनी होगी कि उससे उनमें राजनीतिक परिवर्तन की
इच्छा पैदा न हो।’ ... अपने परिवारों तथा देश के प्रति हमारे कर्तव्यों को ‘स्वयं प्रभु’
ने हमारे लिए निश्चित किया है। हमें अधिकार नहीं है कि दूरस्थ अजनबियों को
बेहतर लाभ प्रदान करने का परोक्ष अवसर देने के लिए हम उनका साथ छोड़ दें।
इस प्रकार के तर्क संसद पर हावी हो गए और उसके कारण 1793 में खंड को रद्द कर दिया गया। विल्बरफोर्स ने संसद-सदस्यों को ताना मारते हुए स्मरण कराया कि उनका ईसाई धर्म भौतिक लाभार्जन का धर्म नहीं है, बल्कि वह तो कानून द्वारा सुस्थापित धर्म है। लेकिन जैसा कि स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘18वीं सदी के अधिकांश महत्वपूर्ण लोगों के लिए भौतिक लाभार्जन के रूप में राज्य तथा समाज