396 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
द्वारा मान्य धर्म कुछ ऐसी वस्तु थी, जिसका उपयोग स्वदेश में सच्चाई और विवेक के साथ किया जाना चाहिए। विदेशों में अंधाधुन उसका प्रसार करने की कोई जरूरत नहीं थी। जैसा कि अक्सर कहा गया है, सामान्य वातावरण बहुत कुछ आगस्टन रोम जैसा था। उदारचेता कूटनीतिज्ञ के लिए सभी धर्म समान रूप से उपयोगी थे और प्रत्येक का अपना समुचित स्थान था। ख्1,
मिशनरियों के लिए द्वार खोलने का प्रयास विफल हो गया और 1813 तक मिशनरी को भारत में घुसने नहीं दिया गया। न केवल उसे घुसने नहीं दिया गया, बल्कि कंपनी की सरकार ने ऐसे इक्के-दुक्के मिशनरी की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी, जिसने उसके आज्ञा-पत्र के बिना भारत में जाने का प्रयास किया।
सन् 1793 में डॉ. कैरी बिना आज्ञा-पत्र के घुसपैठिए के रूप में गए। चूंकि उन्हें आज्ञा-पत्र न होने के कारण कलकत्ता में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई, अतः उन्होंने कलकत्ता से 14 मील दूर सेरामपोर को अपनी गतिविधि का अड्डा बनाया। सेरामपोर डेनिश बस्ती थी और डेनों ने मिशनरियों अथवा मिशनरियों के प्रचार पर कोई रोक नहीं लगा रखी थी। इसके विपरीत सेरामपोर के गवर्नर ने सक्रिय रूप से उनकी मदद की। कैरी और उनका मिशन सदैव कंपनी सरकार की आंखों में खटकता रहा। 1798 में सेरामपोर मिशन ने चार मिशनरियों को काम पर लगाने का निश्चय किया। वे 1800 में वहां पहुंचे। वे रहने के लिए सेरामपोर की डेनिश बस्ती में गए। वस्तुतः गवर्नर-जनरल का उनसे कोई वास्ता नहीं था। लेकिन कंपनी के गवर्नर-जनरल को इन अनधिकृत धर्मानुरागियों का अज्ञातवास सहन नहीं हुआ। लार्ड वेलेजली में सेरामपोर के गवर्नर को लिखा, ‘क्या महामहिम इन घुसपैठियों के निष्कासन की व्यवस्था करेंगे, जो किसी भी समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य-क्षेत्रों का अतिक्रमण कर सकते हैं।’ इसके जवाब में डेनिश गवर्नर ने कहा कि वह ऐसा कुछ नहीं करेंगे। ख्2, ऐसी ही कार्यवाही 1806 में की गई जब कप्तान विक्स दो और मिशनरियों को ‘क्राइटेरियन’ में लाए, जिसने कलकत्ता के पास लंगर डाला। उस समय सर जार्ज बार्लो गवर्नर-जनरल थे। ये दो मिशनरी जहाज से न उतर सके, उसके लिए उन्होंने अति असाधारण कार्यवाही की। उन्होंने आदेश दिया कि जब तक कप्तान इन दो मिशनरियों को वापस ले जाने के लिए राजी न हो जाएं, तब तक उन्हें उनका रवन्ना न दिया जाए, जब कि स्थिति यह थी कि वे रहने के लिए सेरामपोर चले गए थे और वस्तुतः डेनिश सरकार के संरक्षण में थे। मिशनरियों में प्रति ख्3, यह रवैया न केवल अनुचित था, बल्कि ऐसा था जिसे केवल शत्रुतापूर्ण ही कहा जा सकता है।
मेह्यू, क्रिश्चियनिटी एंड दि गनर्नमेंट ऑफ इंडिया, पृ. 51
जे.सी. मार्शमैन, लाइफ एंड टाइम्स ऑफ कैरी, मार्शमैन एंड वर्ड, खंड 1
वही, पृ. 307