धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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सन् 1806 में भारतीय सैनिको ने जो वेल्लोर विद्रोह किया था, उसे नितांत गलत ढंग से मिशनरी प्रचार के मत्थे मढ़ दिया गया था। सर जार्ज बार्लो ने हड़बड़ाहट में सेरामपोर मिशनरियों की गतिविधियों पर ये प्रतिबंध लगा दिए थेः
मिशनरी सेरामपोर में ही रहें।
वे बाजार में खुलेआम प्रचार न करें।
देशी धर्मान्तरित प्रचार कर सकते हैं, बशर्तें उन्हें सेरामपोर से दूतों के रूप
में न भेजा गया हो।
सन् 1807 में बंगाल की सरकार ने सेरामपोर मिशन के प्रति घोर उग्रता का प्रदर्शन किया। आरोप था कि मिशन ने इस्लाम पर एक पुस्तिका निकाली और उसमें अति असावधानी से पैगम्बर मुहम्मद को पाखंडी कहा। यह भी इस बात का प्रमाण है कि मिशनरियों के प्रति कंपनी की सरकार का कितना शत्रुतापूर्ण रवैया था।
बंगाल सरकार डॉ. कैरी की क्षमायाचना से संतुष्ट नहीं हुई और उसने आग्रह किया कि प्रेस को सेरामपोर से कलकत्ता लाया जाए, ताकि सरकार वहां से प्रकाशित साहित्य पर बेहतर तरीके से नियंत्रण रख सके। इस समाचार से मिशन घबरा गया, क्योंकि इसका अर्थ उसका विघटन था। सदा की भांति डेनिश बस्ती के गवर्नर ने उनकी रक्षा की। उसने सेरामपोर के भयभीत मिशनरियों से कहा कि वह उनकी ओर से विरोध करेगा, यदि बंगाल की सरकार जबरन प्रेस को हटाकर कलकत्ता ले गई। बाद में मामले का निपटारा हो गया और आदेश वापस ले लिया गया। लेकिन तथ्य यह है कि कंपनी की सरकार का मिशनरियों के प्रति मैत्रीभाव नहीं था।
इतना बहाना तो वे वैध रूप से बना सकते हैं। लेकिन उस समय उनका रवैया क्या रहा, जब 1813 के बाद उन्हें इस क्षेत्र में कार्य करने की अनुमति दे दी गई? क्या उन्होंने यह नीति अपनाई कि धर्मान्तरित की सोच और जीवन में जाति का कोई स्थान नहीं रहेगा? प्रोटेस्टैंट मिशनरी की सर्वप्रथम घोषणा भी इसका उत्तर ‘हां’ में नहीं देती। मिशनरी जातिप्रथा को सहन नहीं करते। डॉ. हेन ने 1814 में लिखाः
मिशनरियों ने अपनी तीव्र अथवा अंतिम सफलता प्राप्त करने के फेर में अति
हानिकर प्रकार की गलती की है। किसी हिंदू को ईसाई बनाते समय वे उसे ऐसी
आचरण-शैली अपनाने पर विवश करते हैं, जिससे वह अपनी जाति को गंवा
देता है। भारत में यह ऐसा कलंक समझा जाता है कि उससे धर्म-परिवर्तन में
भारी बाधा पड़ेगी ही, पर हिंदुओं का राजनीतिक विभाजन उनके धार्मिक सिद्धांतों