धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
399
वह दक्षिण भारत के स्थानीय निवासियों में प्रचलित है। वह ‘विशुद्ध लौकिक विचार है और झूठे अथवा सच्चे धर्म संबंधी उनके मन की किसी धारणा से उसका कोई संबंध नहीं है।’ उच्च जाति के देशी धर्मान्तरित नहीं चाहते कि वे निम्न जाति के धमान्तरितों के साथ संपर्क रखें। उसका आधार धर्म अथवा अंधविश्वास नहीं है, बल्कि सामाजिक है। उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के लोगों के बीच कुछ भेदभाव हैं, जो कि किसी भी दृष्टि से आदर्श नहीं हैं। इन भेदभावों पर केवल लौकिक संपदा के अर्जन का मुलम्मा नहीं चढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने खास तौर पर बताया कि निम्न वर्ग के लोगों की आदत है कि वे अशिष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं। अक्सर वे भद्दी और फूहड़ बातें करते हैं, जो उच्च वर्ग की भावनाओं के नितांत प्रतिकूल होती हैं। उनके रहन-सहन के ढंग में न गरिमा होती है और न आत्म-सम्मान। उन्होंने कहा कि विद्यार्जन से उनकी उन्नति हो सकती है और यदि कोई पेरिया विद्वान हो जाएगा तो उसे पंडित कहा जाएगा तथा चर्च उसका सम्मान करेगा। तब उसके धर्मान्तरित साथी उसके साथ उठेंगे, बैठेंगे। लेकिन फिर भी वे ‘लोकाचार अथवा अहंकार’ के कारण उसके साथ बैठकर एक ही थाली में नहीं खाएंगे। जिगेनबाल्ग के जमाने से वे चर्च में दो अलग-अलग खानों में बैठते आए हैं और प्रभु की मंडली में उन्होंने अलग-अलग परम प्रसाद ग्रहण किया है। उन्होंने एक ही प्याले से प्रसाद का पान किया है, लेकिन पहले उसका पान सवर्ण धर्मान्तरितों ने किया है। लेकिन इस बात के प्रमाण के रूप में कि ये सब केवल सांसारिक भेदभाव माने जाते हैं, क्रिश्चियन डेविड ने कहा कि दक्षिण के ईसाई समुदायों में उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग के शवों को एक ही कब्रिस्तान में दफनाया जाता है और अंतिम संस्कार में वे मिल-जुलकर भाग लेते हैं, ‘मानों कि गैर-ईसाई देशों की भावना के विपरीत उनकी भावना हो कि मौत तो सभी भेदभावों को मिटा देती है।’
कठोर नियम तो ईसाई धर्म के मार्ग में भारी अड़चनें सिद्ध होतीं। ऐसे नियम बनाने के बजाए वयोवृद्ध मिशनरियों ने मीठी फटकार और अनुरोध से इस बुराई को मिटाने का प्रयास किया। क्रिश्चियन डेविड ने बताया कि इवार्ट्ज के धर्मसेवा-काल में यह बुराई काफी कम हो गई थी। लेकिन चर्च मिशनरी सोसाइटी के वस्तुतः ईमानदार तथा धर्मनिष्ठ ईसाई श्री रेनियस ने ईसाई शिक्षकों के कर्तव्यों के बारे में भिन्न दृष्टिकोण अपनाया था और उन्होंने दक्षिण के युवा मिशनरियों को अपने दृष्टिकोण से सहमत करा लिया था। जैसा कि मैं कह चुका हूं, वे आपस में इस बात के लिए सहमत हो गए कि ईसाई धर्म में प्रवेश के लिए जातिप्रथा के पूर्ण उन्मूलन को उसके निरे सामाजिक पक्ष में भी अनिवार्य शर्त बनाया जाए। इसके