धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
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दें, लेकिन सारतः एक चीज दूसरी चीज से कुछ-न-कुछ भिन्न तो होती ही
है। यह एक जाना-माना ईसाई सिद्धांत है कि प्रभु की दृष्टि में सभी बराबर हैं।
लेकिन यह बात भी उतनी ही निश्चित है कि मनुष्य की दृष्टि में सभी बराबर
नहीं हैं। अतः यह एक समुचित धारणा है कि प्रभु उन्हें कदापि बराबर नहीं
बनाना चाहता था। सामाजिक भेदभाव सर्वत्र पाए जाते हैं। बिशप ने तर्क प्रस्तुत
किया कि यदि दक्षिणी तट पर बसे धर्मान्तरितों के बीच पाए जाने वाले भेदभाव
केवल सामाजिक भेदभाव हैं तो उसे विधि-साम्य को लागू करने के फेर मे हम
अपने प्रयासों की सफलता को जोखिम में क्यों डालें, जो व्यक्तियों के किन्हीं
अन्या वर्गों में नहीं है?
अपने विवेकानुसार बिशप हेबर ने गुरु से कहा कि यदि वह भारत में ईसाई
ध्येय की कोई सेवा कर सकते हैं तो वह मध्यस्थ के रूप में होगी। उन्होंने कहा
कि सुलह-सफाई के मार्ग पर चलकर और अति-उत्साह की कटुताओं को कम
करके वह प्रमुख मिशनरी के रूप में अधिक हित-साधन की आशा कर सकते
हैं और अब उनका विचार है कि उनका फर्ज है कि वह अपने प्राधिकार से उन
लोगों का पलड़ा भारी करें, जिन्होंने संकल्प किया है कि पुरानी बोतलों में बहुत
अधिक नई शराब ठूंसने की कोशिश न की जाए।
इस दृष्टिकोण को और भी जोरदार तरीके से एक अन्य प्रोटेस्टैंट मिशनरी श्रद्धेय राबर्ट नोबिल ने व्यक्त किया। वह 1841 में भारत आए थे और मसुलीपत्तम में इंग्लैंड के मिशनरी कार्य से संबंधित चर्च के प्रभारी थे। उन्होंने यह नियम बना दिया कि पेरियाओं, चर्मकारों, तथा जमादारों को उनके स्कूल से अलग रखा जाए। जब उन पर आरोप लगाया गया कि वह ईसाई धर्म में जातिवाद को घुसेड़ रहे हैं तो उन्होंने अपने पक्ष का समर्थन करते हुए कहाः
इंग्लैंड के सर्वाधिक दीन-हीन तथा सर्वाधिक पवित्रात्मा ईसाई माता-पिता भी
अपने पुत्रों को तो क्या, पुत्रियों को भी अपने मोचियों, अपने रसोइयों तथा अपनी
बर्तन साफ करने वाली नौकरानियों के साथ पढ़ने की अनुमति नहीं देंगे। संभवतः
और कारणों की अपेक्षा मेरे पवित्रात्मा पिता इस कारण अक्सर सजा देते थे कि
मैं चोरी-चोरी गांव के लड़कों के साथ खेलने के लिए चला जाता था। सर्वाधिक
सुव्यवस्थित ईसाई परिवार में भी मैंने सदा देखा है कि बच्चों को अनुमति नहीं
दी जाती है कि वे नौकरों से बात करें या नीचे रसोईघर में चले जाएं। मेरे पिता
कभी भी हमें रसोइए या साईस के पुत्र के साथ खेलने की अनुमति नहीं देते।
न ही मैं इसे उचित समझता हूं कि ब्राह्मणों से अपेक्षा की जाए कि इससे पूर्व
कि हमें उन्हें ‘बाइबिल’ की शिक्षा दें, वे पेरिया और जमादार के साथ एक ही