16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 417

402 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कक्षा में बैठकर पढ़ें। यह अपेक्षा मुझे अनुचित और ईसाई सिद्धांत के प्रतिकूल

लगती है।

यह सच है कि हेबर के काल से ही अनेक बुद्धिमान तथा निष्ठावान ईसाई अनुभव करते रहे कि वह पूर्णतः गलत थे। बाद में बिशप विल्सन ने उनके निर्णय को उलट दिया। उन्होंने जातीय असमानताओं को सहन करने का जोरदार विरोध इस आधार पर किया कि वह हिंदू धर्म का स्वाभाविक अंग है। लेकिन भारतीय ईसाइयों में जाति के स्थान के बारे में असमानता का यह तथ्य न केवल सरकारी दृष्टिकोण, अपितु प्रोटेस्टैंट मिशनों ख्1, का भी सामान्य दृष्टिकोण बना रहा।

इस प्रकार सभी मिशनरी सहमत थे कि ईसाई धर्म को सरल बनाया जाए, ताकि भारत में उसका प्रचार व प्रसार हो सके। इस बिंदु के बारे में दीख पड़ता है कि कैथोलिकों, लुथेरनरों अथवा प्रोटेस्टैंटों के बीच एक किस्म का भेद है। ऐसा जो भेद है भी, वह डिग्री का है। यदि ईसाई धर्मान्तरितों के बीच जातिप्रथा और उस जैसी अन्य चीजें हैं तो वे इस नीति की, यानि ईसाई धर्म को सरल बनाने की नीति की देन हैं। इस नीति को अपनाते समय मिशनरियों ने यह कभी नहीं सोचा कि किसी दिन कोई उनसे यह प्रश्न कर बैठेगा, ‘किसी हिंदू के लिए ईसाई धर्म किस काम का है, यदि वह जातिप्रथा से उसका पिंड नहीं छुड़ा सकता।’ उन्होंने अपने मिशन को समझने में भूल की और सोचा कि किसी व्यक्ति को ईसाई बनाने और उसे यीशु का अनुयायी बनाने में कोई अंतर नहीं है।

V

आइए, प्रश्न के दूसरे भाग पर विचार करें। क्या ईसाई धर्म धर्म-परिवर्तन करने वाले को उस कष्ट और घृणित व्यवहार से बचा सकता है, जो अस्पृश्य के रूप में जन्में हर व्यक्ति का दुर्भाग्य रहा है? क्या कोई अस्पृश्य ईसाई बन जाने के बाद किसी सार्वजनकि कुंए से पानी ले सकता है? क्या उसके बच्चों को किसी पब्लिक स्कूल में दाखिला मिल सकता है? क्या वह ऐसे किसी होटल या शराबखाने में प्रवेश कर सकता है, जिसके द्वार उसके लिए खुले हुए नहीं थे? क्या वह किसी दुकान में

  1. लेकिन अमरीका के प्रोटेस्टैंट मिशनरियों के पक्ष में एक अपवाद करना ही होगा। जुलाई 1847 में इस

प्रश्न के बारे में अमरीकी मिशनरियों ने निम्न संकल्प पारित कियाः मिशन मानता है कि जातिप्रथा

मूर्तिपूजावाद का अनिवार्य अंग है और कहता है कि पवित्रता के संतोषजनक साक्ष्य के रूप में यह

अनिवार्य है कि उसका पूर्णतः तथा वस्तुतः परित्याग किया जाए और यह भी कहता कि जातिप्रथा के

परित्याग का अर्थ कम-से-कम यह तो होगा कि समुचित परिस्थितियों में किसी भी जाति के ईसाइयों

के साथ सहभोज किया जा सकता है।