16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 418

धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति

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प्रवेश करके चीजें खरीद सकता है? क्या कोई नाई उसकी हजामत करेगा? क्या कोई धोबी उसके कपड़े धोएगा? क्या वह किसी बस में यात्रा कर सकता है? क्या वह बिना किसी कष्ट के सरकारी दफतरों में प्रवेश पा सकेगा? क्या वह गांव के स्पृश्य वर्ग के क्षेत्रों में निवास कर सकेगा? क्या हिंदू उसके हाथ हाथ से पानी पिएंगे? क्या वे उसके साथ खान-पान करेंगे? क्या उसका स्पर्श होने पर हिंदू स्नान नहीं करेंगे? मुझे पूर्ण विश्वास है कि इनमें से हर प्रश्न का उत्तर ‘ना’ में होगा। या यूं कहिए कि धर्म-परिवर्तन से धर्मान्तरित अस्पृश्य के सामाजिक दर्जे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। भले ही कोई अस्पृश्य ईसाई बन गया हो, पर आम हिंदू की नजरों में वह अस्पृश्य ही रहता है।

प्रश्न यह है कि क्या कारण है कि ईसाई धर्म धर्मान्तरित अस्पृश्य के दर्जे को बढ़ाने में सफल नहीं हुआ है? इस विफलता के क्या कारण हैं? मुझे विश्वास नहीं है कि समस्या में रुचि रखने वाले सभी लोग मेरे द्वारा बताए गए कारणों को स्वीकार ही करेंगे। लेकिन मैं बताना चाहूंगा कि उन कारणों का महत्व क्या है। अपनी बात को समझने के लिए मैं सर्वप्रथम यह बताना चाहूंगा कि धर्मान्तरित के सामाजिक दर्जे में परिवर्तन दोहरे परिवर्तन के फलस्वरूप हो सकता है। एक तो हिंदुओं के रवैए में परिवर्तन होना ही चाहिए। दूसरे, धर्मान्तरित की मनोवृत्ति में भी परिवर्तन होना ही चाहिए। दर्जा द्विपक्षीय मामला है। यह दो व्यक्तियों के बीच का मामला है। जब तक दोनों अपनी पुरानी स्थिति को नहीं छोड़ते, कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति से आगे बढ़ें, इसके लिए ईसाई मिशनके कर्ताधर्ता लोगों ने क्या किया है? प्रश्न पर विचार करने से हम समझ सकेंगे कि किस कारण ईसाई धर्म धर्मान्तरित अस्पृश्य के दर्जे को बढ़ाने में विफल रहा है।

प्रश्न पर खंडशः विचार करना होगा। हिंदुओं को आगे बढ़ने के लिए विवश किया जाए, इसके लिए ईसाई धर्म ने क्या किया है? मैं देखता हूं कि उसने कुछ नहीं किया है। लगता है कि वे तो किसी चमत्कारी सूझ पर निर्भर करते हैं। इस चमत्कारी सूझ के प्रति आस्था दिवंगत ड्यक ऑफ आर्गाइल ने भली-भांति व्यक्त की है। उन्होंने कहा है ख्1, ः

इससे सशक्त सुधार का उपाया कोई है ही नहीं। यदि किसी झूठी या भ्रष्ट

आस्था अथवा किसी घिनौनी या क्रूरतापूर्ण व्यवस्था के साथ-साथ हम किसी

‘एकल-विरोधी सूझ’ को खड़ा कर दें, तो बिना किसी शोरगुल या झगड़े-फसाद

के वे आस्थएं और प्रथाएं एक सूझ मात्र से आंदोलित हो जाएगी। इस प्रकार

ईसाई धर्म ने बिना किसी आलोचना के गैर-ईसाई जगत के एक सबसे बड़े

  1. सी. एफ. एंड्रयूज द्वारा उद्धृत, क्राइस्ट एंड लेबर, पृ. 25