404 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तथा सर्वाधिक प्रचलित अभिशाप को नष्ट कर दिया। वह था, दिनोंदिन गहराता
गुलामी का अभिशाप।
किसी सूझ का जो भी महत्व हो, पर मुझे पूरा विश्वास हे कि इतिहास ड्यूक ऑफ आर्गाइल के निष्कर्ष का समर्थन नहीं करता। यह विवादास्पद प्रश्न है कि क्या रोमन साम्राज्य में गुलामी का अंत ईसाई धर्म के प्रभाव से हुआ? इसमें संदेह नहीं कि भले ही यूरोप में कई सौ वर्षों तक ईसाई धर्म एक सुदृढ़ व्यवस्था के रूप में बना रहा, पर फिर भी वहां गुलाम-प्रथा बनी रही। यह एक आकाट्य तथ्य है कि अमरीका में ईसाई धर्म नीग्रो लोगों की गुलामी को नहीं मिटा सका। वहां ईसाइयों ने ही उन्हें आजादी से वंचित किया और नीग्रो लोगों को आजादी दिलाने के लिए गृह-युद्ध जरूरी हो गया।
अतः ईसाई मिशन के प्रभारी इस बात पर निर्भर रहे कि किसी सूझ को रोप दिया जाए, जो चमत्कार कर दे। यह निर्भरता भी एक कारण है कि ईसाई बन जाने के बाद भी अस्पृश्य, अस्पृश्य ही बना रहा है।
अब प्रश्न के दूसरे भाग पर विचार कर लें। क्या ईसाई धर्म अस्पृश्य को अपनी स्थिति में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देता है? मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि (वह) प्रेरणा नहीं देता। जहां तक मैं देख सका हूं, अस्पृश्य के लिए ईसाई उपदेश ‘व्यावहारिक’ सुधारों पर कम और ईसाई सामाजिक दृष्टिकोण पर अधिक केंद्रित है। अस्पृश्यों के धर्मान्तरण की इच्छा रखने वाले ईसाई आग्रह करते हैं कि ईसाई धर्म को विशुद्ध ‘आध्यात्मिक’ माना जाए। यह शिक्षा निश्चय ही अति मूल्यवान है कि ईसाइयों का दायित्व है कि वे दूसरों से प्रेम करें। लेकिन वहीं विराम लगाकर यह तर्क देना कि सामाजिक दृष्टिकोण में अभिव्यक्त आध्यात्मिक जीवन का भौतिक जीवन से कोई संबंध नहीं है और ईसाइयों का उससे कोई वास्ता नहीं हो सकता, मेरे विचार से कोरा सिद्धांत बघारना है। सज्जन और न्यायकारी बनने के लिए किसी पापाचारी को दैनिक उपदेश देने में क्या तुक है, यदि सज्जन उपदेश के बाद पापाचारी को और न्यायकारी बनाने के लिए कार्य करें। ईसाई मिशनरियों ने कभी भी यह नहीं सोचा है कि यह उनका कर्तव्य है कि वे कार्य करें और धर्म-परिवर्तन के बाद भी अस्पृश्य के प्रति जो अन्याय होता हे, उसे दूर कराएं। निश्चय ही यह अति खेद का विषय है कि सामाजिक उद्धार के मामले में मिशन अति निष्क्रिय हैं। लेकिन इससे भी कहीं अधिक पीड़ाजनक ईसाई धर्म अंगीकर करने वाले अस्पृश्य की निष्क्रियता है। वह सर्वाधिक खेद का विषय है। वह हिंदुओं के हाथों उन्हीं असुविधाओं को भोगता रहता है, जिन्हें वह धर्म-परिवर्तन से पहले भोग रहा था। यह कैसी असाधारण बात है कि अन्याय-निवारण संबंधी आंदोलन वे अस्पृश्य चला रहे हैं, जो अभी ईसाई नहीं बने