16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 420

धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति

405

हैं। मैंने कभी भी नहीं देखा है कि अपने सामाजिक अन्यायों के निवारण के लिए सम्मेलनों में अस्पृश्य ईसाई भाग ले रहे हों। यह निर्विवाद है कि उनकी शिकायतें हैं। यह भी जग-जाहिर है कि उनके संघर्ष में उनका नेतृत्व करने के लिए अनेक काफी पढ़े-लिखे लोग हैं। तो फिर क्या कारण है कि उनके प्रति हुए अन्यायों के निवारण के लिए कोई आंदोलन नहीं हुआ है?

मेरे विचार में तीन कारण हैं, जिनकी वजह से अस्पृश्य ईसाई आंदोलन नहीं छेड़ सके हैं?

पहला कारण तो यह है कि पढ़े-लिखे ईसाइयों के मन में संप्रदाय के हित-साधन और उसके लिए संघर्ष करने की कोई इच्छा है ही नहीं। मेरे विचार में उसका कारण यह है कि ईसाई संप्रदाय के भीतर शिक्षित वर्ग और अशिक्षित वर्ग के बीच कोई नातेदारी नहीं है। ईसाई संप्रदाय एक मिलाजुला खिचड़ी संप्रदाय हैं कहीं-कहीं वह स्पृश्यों और अस्पृश्यों के रूप में बंटा हुआ है। सर्वत्र वह उच्च वर्ग और निम्न वर्गों में बंटा हुआ है। शिक्षित वर्ग अधिकांशतः स्पृश्य अथवा उच्च वर्ग से आया है। यह शिक्षित वर्ग ईसाइयों के निम्न अथवा अस्पृश्य वर्ग से कटा हुआ है और वह निम्न वर्ग के अभावों, पीड़ाओं, इच्छाओं, आकांक्षाओं, अपेक्षाओं से सहानुभूति नहीं रखता है। वह उनके हितों की उपेक्षा करता है। अतः अस्पृश्य ईसाइयों का कोई रहनुमा नहीं है। इसी कारण वे अपने प्रति हुए अन्यायों को दूर करने के लिए संगठित नहीं हो सकते।

अस्पृश्य ईसाइयों का कोई आंदोलन नहीं है, इसका दूसरा कारण यह है कि धर्मान्तरित की मानसिकता में कुछ दोष है। अस्पृश्य ईसाई की मानसिकता की एक

खासियत यह है कि उसमें अनेक बंधनों से मुक्त होने की कोई ललक है ही नहीं। अस्पृश्य ईसाई में किसी ललक के इस अभाव का क्या कारण है? मुझे ऐसा लगता है कि इसके दो कारण हैं। एक कारण तो अस्पृश्य ईसाई के पूर्ववृत्त में पाया जाता है। अस्पृश्य या तो ईसाई इसलिए बनता है कि उसे किसी लाभ का लोभ होता है या फिर वह ‘बाइबिल’ के उपदेश पसंद करता है। लेकिन ईसाई बनने वाला ऐसा अस्पृश्य बिरला ही होता है, जिसके मन में सुनिश्चित असंतोष हो या वह हिंदू धर्म के उपदेशों को पसंद न करता हो। नतीजा यह होता है कि ईसाई धर्म उसके पुराने धर्म का पुंछल्ला बनकर रह जाता है। वह उसके पुराने धर्म का स्थान नहीं लेता। वह दोनों से चिपका रहता है और प्रत्येक के लिए उपयुक्त अवसर आने पर दोनों का पालन करता है।

मेरा विचार है कि ललक के अभाव का दूसरा कारण ईसाई धर्म के उपदेश हैं। ईसाई धर्म सिखाता है कि व्यक्ति का पतन उसके मूल पाप के कारण होता है और