406 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किसी व्यक्ति को ईसाई क्यों बनना चाहिए, उसका कारण यह है कि ईसाई धर्म में पापों की क्षमा का वचन दिया गया है। इस सिद्धांत का धर्मविज्ञान-समस्त तथा सुसमाचार-सम्मत जो भी आधार रहा हो, पर इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि समाज-विज्ञान की दृष्टि से यह एक ऐसा सिद्धांत है, जिससे विनाश ही विनाश है। यह ईसाई उपदेश समाज-विज्ञान के लिए एक सीधी चुनौती है, क्योंकि उसकी मान्यता है कि व्यक्ति के पतन का कारण उसकी प्रतिकूल परिस्थितियां हैं, न कि उसके पाप। यह निर्विवाद है कि समाज-विज्ञान का दृष्टिकोण सही दृष्टिकोण है और ईसाई सिद्धांत व्यक्ति को केवल गुमराह करता है। वह उसे गलत रास्ते पर भटका देता है। ठीक ऐसा ही अस्पृश्य ईसाई के साथ हुआ है। बजाए इसके कि उसे सिखाया जाता है कि उसके पतन का कारण गलत सामाजिक तथा धार्मिक वातावरण है और अपने सुधार के लिए उसे उस वातावरण पर प्रहार करना ही होगा, उसे जताया जाता है कि उसके पतन का कारण उसका पाप है।
नतीजा यह होता है कि धर्मान्तरित अस्पृश्य वातावरण पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा प्राप्त करने के स्थान पर स्वयं को यह दिलासा देकर संतुष्ट कर लेता है कि संघर्ष करने से कोई लाभ नहीं और उसका सहज कारण है कि उसके पतन का कारण उसका पाप नहीं है, अपितु उसका कारण उसके आदम नामक किसी परोक्ष पूर्वज का पाप है। जब वह हिंदू था तो उसके पतन का कारण उसका ‘कर्म’ था। जब वह ईसाई बनता है तो उसे पता चलता है कि उसके पतन का कारण उसके पूर्वज का पाप है। दोनों अवस्थाओं में उसके लिए बचने का कोई मार्ग नहीं है। हम प्रश्न कर सकते हैं कि धर्म-परिवर्तन नए जीवन का उदय है या पुराने का खंडन?
VI
भारत में भारतीय ईसाई संप्रदाय का क्या कोई महत्व है? देश के मामलों के निपटारे में उसका क्या महत्व और प्रभाव है? उसका महत्व और प्रभाव तो देश और समाज, दोनों में ही होना चाहिए। निश्चय ही वह देश का सर्वाधिक शिक्षित और प्रबुद्ध संप्रदाय है। भारत के अन्य अनेक संप्रदायों के मुकाबिले भारतीय ईसाइयों में न केवल साक्षरता का प्रतिशत सापेक्षतः अधिक है, बल्कि अपने से कहीं अधिक संख्या वाले संप्रदायों की अपेक्षा उसके बीच विश्वविद्यालय-स्नातकों, डाक्टरों, वकीलों की संख्या भी कहीं अधिक है। न केवल पुरुष ही, बल्कि महिलाएं भी शिक्षित हैं। यह कहना ही पड़ेगा कि इस समूचे ज्ञान और पांडित्य के बावजूद भारत के मामलों में यदि उसका कोई महत्व है, तो वह नगण्य है। इस बारे में मतभेद हो सकता है। लेकिन मेरे इस निष्कर्ष का आधार यथासंभव मेरा सूक्ष्म तथा निष्पक्ष अध्ययन है। मेरा विरोधी कह