धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति
407
सकता है कि मेरी बात गलत है या मैं गलत तस्वीर पेश कर रहा हूं। लेकिन मुझे इस बात का संतोष है कि कुछ ऐसे भारतीय ईसाई हैं, जो मेरे दृष्टिकोण और मेरे खेद से सहमत हैं। यहां मैं ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित दो पत्रों को प्रस्तुत कर रहा हूं।
पहला पत्र एक भारतीय ईसाई ने श्री गांधी को लिखा था। 25 अगस्त, 1921 को उसका प्रकाशन ‘यंग इंडिया’ में हुआ। उसमें कहा गया हैः
मुझे खेद है कि आप हम भारतीय ईसाइयों को भारतवासी नहीं मानते, क्योंकि मैंने अनेक बार देखा है कि ‘यंग इंडिया’ मुसलमानों, हिंदुओं, सिखों आदि का तो उल्लेख करता है, पर ईसाइयों की उपेक्षा करता है।
मैं आपको विश्वास दिलाना चाहूंगा कि हम भारतीय ईसाई भी भारतवासी हैं और भारत के निजी मामलों में पर्याप्त रुचि लेते हैं।
प्रस्तुत है इस पत्र के बारे में श्री गांधी की प्रतिक्रिया। वह कहते हैंः
मैं संवाददाता तथा अन्य भारतीय ईसाइयों को आश्वासन देना चाहता हूं कि असहयोग आंदोलन में धर्म अथवा जाति के लिए कोई स्थान नहीं है। वह सभी को अपने झंडे के नीचे आने के लिए आमंत्रण और अवसर देता है। अनेक भारतीय ईसाइयों ने तिलक स्वराज फंड में अंशदान किया है। कुछ प्रसिद्ध भारतीय ईसाई असहयोग आंदोलन की अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता हैं। मुसलमानों और हिंदुओं का लगातार उल्लेख हुआ है, क्योंकि वे अभी तक एक-दूसरे को शत्रु समझते रहे हैं। इसी प्रकार इसके पीछे सदैव कोई कारण रहा है कि इन स्तंभों में किसी जाति का विशेष उल्लेख किया गया है।
इस प्रश्न के अलावा कि यह सच है या नहीं कि अनेक भारतीय ईसाइयों ने तिलक स्वराज फंड में अंशदान किया है और यह सच है या नहीं कि प्रख्यात ईसाई असहयोग आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता थे, श्री गांधी ने संवाददाता के मुख्य प्रश्न का जो उत्तर दिया है, वह यदि भ्रामक नहीं तो सही भी नहीं है। यदि मुसलमानों का उल्लेख केवल इसलिए किया जाता है कि वे हिंदुओं को अपना शत्रु समझते हैं, तो सिखों का उल्लेख क्या किया गया? निश्चय ही सिख तो हिंदुओं को अपना शत्रु नहीं मानते। उनका उल्लेख क्यों किया गया? सिखों का न केवल उल्लेख ही किया गया, बल्कि उन्हें ऐसा प्रमुख पक्ष माना गया, जिसके सक्रिय सहयोग के बिना स्वराज का आंदोलन चलाया ही नहीं जा सकता। और यह भी याद रखा जाए कि सिखों ने सहयोग बिना शर्त के नहीं दिया। सभी जानते हैं कि सिखों ने अपने सहयोग के बदले में दो शर्तें रखी थीं। ख्1, एक शर्त यह थी कि भारत का जो राष्ट्रीय झंडा बनाया
- यंग इंडिया, 4 अगस्त, 1921