16. धर्म-परिवर्तन करने वाले की स्थिति - Page 423

408 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जाए, उसमें सिखों के तथाकथित काले रंग को स्थान दिया जाए। उनकी दूसरी मांग थी कि कांग्रेस उन्हें गारंटी दे कि उन्हें विधान-मंडल में प्रतिनिधित्व मिलेगा ही। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सिखों का उल्लेख ही नहीं, बल्कि तुष्टिकरण भी किया गया। लेकिन ईसाइयों का तो उल्लेख भी नहीं किया गया। अब भारतीय ईसाइयों का उल्लेख न करने के केवल दो स्पष्टीकरण हो सकते हैं। या तो वे स्वराज के संघर्ष में कांग्रेस का साथ नहीं दे रहे थे या फिर वे इतने नगण्य थे कि उल्लेख के पात्र ही नहीं थे। वे स्वराज के संघर्ष में कांग्रेस का साथ नहीं दे रहे थे, इस बात का खंडन नहीं किया जा सकता। निम्न पत्र एक भारतीय ईसाई ने ‘इंडियन सोशल रिफार्मर’ के संपादक को लिखा था और उसे ‘यंग इंडिया’ में पुनः प्रकाशित किया गया था। वह स्वराज के प्रति भारत के ईसाइयों के रवैए को दर्शाता हैः

हमारे पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि ईसवीं सन् की दूसरी सदी में भी भारत में ईसाई बस्तियां थीं। इस आधार पर भारत के ईसाई दावा कर सकते हें कि इस्लाम की स्थापना के कई सदी पूर्व भारत में उनका अस्तित्व था। तो फिर यह कैसे हो सकता है कि विशुद्ध भारतीय वंश-परंपरा वाले और भारत की धरती पर जन्मे और पले भारतीय ईसाई ने यह न सीखा हो कि वह इस देश के प्राचीन इतिहास व उसकी संस्कृति की कदर करे और उसके लोगों की, चाहे उनके धार्मिक विश्वास कितने भी भिन्न हों, अपना निकट संबंधी समझे? यह कैसे संभव है कि अपने हिंदू तथा मुसलमान सह-नागरिक की भांति उसने उस हर प्रक्रम को गौर से देखा न हो, उसकी कामना न की हो, और आतुरता से उसका स्वागत न किया हो, जो उसकी मातृभूमि की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक संविधि में अभिवृद्धि करता हो। क्या कारण है कि वंदे मातरम् केवल हिंदुओं और मुसलमानों का राष्ट्रीय निर्झर है और अभी तक भारतीय ईसाई द्वारा उपेक्षित है?

पुनः यह कैसे संभव है कि हिंदू तथा मुसलमान, दोनों ही समझते हैं कि उनकी आकांक्षाओं के प्रति भारतीय ईसाई की भावना यदि प्रत्यक्षतः शत्रुतापूर्ण और विपरीत नहीं, ढीली-ढाली तो है ही? क्या कारण है कि भारत में उत्तरोत्तर बलवती होती हुई राष्ट्रीय भावना भारत के ईसाई को बौना और भविष्य में अपनी सुरक्षा के प्रति शंका अनुभव कराती है। ख्1,

सर्वश्री जार्ज जोसेफ, के. टी. पौल और डॉ. एस. के. दत्ता के कथन के बावजूद इस बारे में कोई संदेह नहीं कि भारत के ईसाई संप्रदाय ने स्वराज के संघर्ष में सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया। वह वस्तुतः उसके प्रति सशंक था। यह पत्र भारतीय ईसाइयों

  1. यंग इंडिया, 21 दिसंबर, 1922