वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
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करने वाली वेश्याओं से सहायता लेते हैं। इन पदों पर सबसे ज्यादा योग्य तथा सबसे ज्यादा विश्वस्त व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है।
सातवां वर्ग राजा के सलाहकारों तथा कर-निर्धारकों का है। उन्हें सरकारी प्रशासन, अदालतों तथा सामान्य लोक-प्रशासन के ऊंचे-से-ऊंचे पद दिए जाते हैं। किसी को भी अपनी जाति से बाहर विवाह करने की अनुमति नहीं दी जाती है। कोई भी अपना काम नहीं बदल सकता है। कोई भी एक से अधिक व्यवसाय नहीं कर सकता। केवल पुरोहित पर ऐसा कोई बंधन नहीं होता। उसे यह विशेष अधिकार उसके सद्गुण के कारण दिया जाता है।
अलबरूनी ने भी 1310 ई. के लगभग अपनी भारत-यात्र का विवरण लिखा है। उसने भी हिंदू समाज-संगठन में विलक्षणता देखी। उसने भी इसका वर्णन किया है। वह लिखता हैः
हिंदू अपनी जातियों को वर्ण अर्थात् रंग कहते हैं। वे जातक की जाति उसके जन्म की जाति के आधार पर करते हैं। ये जातियां आरंभ से ही केवल चार हैं।
I. सबसे ऊंची जाति ब्राह्मणों की है। उनके बारे में हिंदू-ग्रंथ कहते हैं कि उनका जन्म ब्रह्मा के सिर से हुआ है। ब्राह्मण उस शक्ति का पर्याय है, जिसे प्रकृति कहते हैं। सिर चूंकि शरीर का सबसे ऊंचा हिस्सा है, अतः ब्राह्मण समस्त जातियों में सर्वोत्तम है। अतः हिंदू उन्हें श्रेष्ठ मानव-जाति मानते हैं।
II. दूसरी जाति क्षत्रियों की है। कहा जाता है कि उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं को कंधों से हुई है। उनकी श्रेणी ब्राह्मण की श्रेणी से अधिक निम्न नहीं है।
III. उनके बाद वैश्य आते हैं। उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जांघ से हुई है।
IV. शूद्र, जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से हुई। वैश्यों और शूद्रों के बीच कोई बहुत बड़ी दूरी नहीं है। फिर भी यह वर्ग एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, पर वे एक ही नगर और गांव में मिल-जुलकर रहते हैं।
शूद्र के बाद वे लोग हैं, जो अन्त्यज कहलाते हैं। वे तरह-तरह की सेवा करते हैं। उनकी गिनती किसी जाति में नहीं होती। वे अपने-अपने व्यवसाय के नाम से जाने जाते हैं। उनके आठ वर्ग हैं और, धोबी, मोची व जुलाहों को छोड़कर, वे बिना किसी संकोच के आपस में शादी-विवाह करते हैं। इसका कारण यह है कि कोई उनसे कोई संबंध रखना नहीं पसंद करता। ये आठ वर्ग हैं - धोबी, मोची, बाजीगर, टोकरी और ढाल बनाने वाले, मल्लाह, मछुआरे, जंगली पशु-पक्षियों