30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का शिकार करने वाले और जुलाहे। ये लोग गांवों व कस्बों के बाहर रहते हैं, जब कि गांवों और कस्बों में उक्त चारों वर्गों के लोग रहते हैं।
हादी, डोम (डोम्ब), चांडाल और बधताऊ की गिनती किसी जाति या वर्ग में नहीं होती। उन्हें गंदा काम करना पड़ता है, जैसे गांवों में सफाई आदि। उन्हें अलग वर्ग के रूप में माना जाता है और प्रत्येक का नाम उसके काम के आधार पर होता है। वस्तुतः उन्हें नाजायज औलाद की भांति समझा जाता है, क्योंकि प्रायः लोग यही समझते हैं कि वे शूद्र पिता और ब्राह्मणी माता के अवैध संबंध से उत्पन्न लोग हैं। अतः उन्हें पतित और जाति-बहिष्कृत माना जाता है।
हिंदू चार वर्णों के हर व्यक्ति को उसके पेशे और जीवन-शैली के अनुसार
खास नाम देते हैं, जैसे ब्राह्मण को सामान्यतः ब्राह्मण तभी कहा जाता है, जब तक वह अपने घर पर रह कर अपना काम करता है। जब वह कहीं यज्ञ करता है तो उसे ‘इष्टिन’ कहते हैं। जब वह तीन यज्ञ कराने में रहता है तो उसे अग्नहोत्री कहते हैं। जब वह यज्ञ कराने के अतिरिक्त उसमें हवि भी देता है, तो वी दीक्षित कहलाता है। जो स्थिति ब्राह्मण की है, वहीं स्थिति अन्य जातियों की भी है, जातियों के नीचे जो वर्ग है, उनमें हादी सबसे अच्छे माने जाते हैं, क्योंकि वे सदा स्वच्छ रहते हैं। उसके बाद डोम का नंबर है। वे गाने-बजाने का काम करते हैं। उनसे भी निचले वर्ग वे हैं, जो वध करते हैं और न्यायिक दंडों को पूरा करते हैं। सबसे घटिया बधताऊ हैं। वे न केवल मृत पशुओं का, बल्कि कुत्तों तथा अन्य पशुओं का मांस भी खाते हैं।
भोज में हर जाति के लोग अलग-अलग अपनी जाति वालों के साथ बैठते हैं और एक वर्ग में दूसरी जाति वाला सम्मिलित नहीं हो सकता। अगर ब्राह्मण वर्ग में कोई ऐसे दो व्यक्ति हों, जो आपस में वैमनस्य रखते हों और उन्हें अलग-अलग बैठना पड़े, तो वे अपने बीच खंपच्ची रखकर या अंगोछा बिछाकर या किसी अन्य तरीके से एक-दूसरे से पृथक अपना चौका बना लेते हैं। आसनों के बीच एक रेखा के भी खींच दिए जाने पर उन्हें अलग-अलग समझा जाता है। चूंकि जूठन खाने की मनाही है, अतः हर व्यक्ति को अपनी-अपनी थाली में अपना भोजन करना चाहिए, क्योंकि जो बाद में भोजन के लिए बैठता है, उसे अपने से पहले वाले की थाली में बचे अन्न को खाने की मनाही होती है, क्योंकि उस बचे अन्न को जूठन समझा जाता है।
अलबरूनी को हिंदू समाज-संगठन में जो कुछ विशेषता मिली, उसने वही सब नहीं लिखा, बल्कि उसने यह भी लिखाः