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वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया

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हिंदुओं में इस प्रकार जातियों की भरमार है। निश्चय ही हम मुसलमान लोग अन्य मामलों में इसके सर्वथा विपरीत आचरण करते हैं। धर्म के प्रति निष को छोड़ बाकी हर तरह से हम सभी को एक-दूसरे के बराबर मानते हैं। यही सबसे बड़ी अड़चन है, जो हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे को समझने और एक-दूसरे के करीब आने में रुकावट पैदा होती है।

दुआर्ते बारबोसा 1500 से 1517 तक भारत में पुर्तगाली सरकार की सेवा में पुर्तगाली अधिकारी रहा। उसने हिंदू समाज के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं। वह लिखता हैः

जब गुजरात राज्य पर मूरों का आधिपत्य हुआ, उससे पहले यहां मूर्तिपूजकों की एक प्रजाति रहती थी। उसे मूर रेस्बुतोस कहते थे। उन दिनों वे इस प्रदेश के सरदार थे। आवश्यकता पड़ने पर वे युद्ध करते थे। ये लोग भेड़ को मारकर उसका मांस खाते हैं। वे मछली आदि भी खाते हैं। पर्वतों में भी उनकी पर्याप्त संख्या है। वहां उनके बड़े-बड़े गांव हैं। वे गुजरात के राजा के शासन को नहीं मानते हैं, बल्कि हर रोज उसके विरुद्ध युद्ध करते हैं। राजा एड़ी-चोटी का जोर लगाने पर भी अभी तक उन पर हावी नहीं हो सका है और न हो सकेगा। वे बढि़या घुड़सवार और बढि़या तीरंदाज हैं। वे अच्छे गोताखोर हैं और उनके पास अपनी रक्षा के लिए तरह-तरह के और भी हथियार हैं। वे लगातार युद्ध करते रहते हैं, फिर भी उनका न कोई राजा है और न ही कोई स्वामी।

और इस राज्य में एक और भी प्रकार के मूर्तिपूजक हैं, जिन्हें वे बनिए कहते हैं। ये बनिए बड़े-बड़े सौदागर और व्यापारी हैं। वे मूरों के बीच रहते हैं और उनके साथ सभी प्रकार का व्यापार करते हैं। ये लोग मांस-मछली को छूते नहीं। वे किसी जीव को नहीं खाते। वे हत्या नहीं करते और न ही किसी पशु की हत्या होते देखना चाहते हें। इस प्रकार वे इतने कट्टर मूर्तिपूजक हैं कि कहते नहीं बनता। अक्सर ऐसा होता है कि मूर जिंदा कीड़े या छोटे परिन्दे उनके पास ले जाते हैं और उनके सामने उन्हें मारने का नाटक करते हैं। बनिए उन्हें

खरीदते हैं और उनकी फिरौती के लिए रकम देते हैं। जितनी कीमत होती है, उससे कहीं अधिक वे देते हैं। वे उनका जीवन बचा लेते हैं और उन्हें मुक्त कर देते हैं। यदि प्रदेश का राजा या उसका कोई अधिकारी किसी व्यक्ति को उसके अपराध के लिए मृत्यु-दंड देता है तो वे एकजुट होकर उसे मृत्यु से बचाने के लिए न्यायालय से छुड़ा लेते हैं, बशर्ते वह उसे छोड़ने के लिए तैयार हो। इसके अलावा मूर भिखारी जब इन लोगों से भिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं तो वे अपने कंधों तथा पेट को बड़े-बड़े पत्थरों से कूटते हैं, मानो कि वे उनके सामने अपनी