32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हत्या कर डालेंगे। वे ऐसा न करें और वहां से शांति के साथ चले जाएं, इसके लिए बनिए उन्हें ढेर सारी भीख देते हैं। बहुत से और भिखारी चाकुओं से अपनी बांहें और टांगे चीरते हैं। इन्हें भी वे हत्या से बचाने के लिए भारी मात्रा में भीख देते हैं। अन्य प्रकार के भिखारी उनके द्वार पर जाते हैं और उनके लिए चूहे और सांप मारने का नाटक करते हैं और उन्हें भी वैसा करने से रोकने के लिए वे बड़ी-बड़ी रकमें देते हैं। इस प्रकार मूर उनकी बड़ी इज्जत करते हैं।
जब सड़क पर इन बनियों के सामने चींटियों का कोई झुंड आ जाता है तो वे पीछे हट जाते हैं और प्रयास करते हैं कि उन पर पैर न पड़ने पाए। अपने घरों में वे दिन के उजाले में ही खाना खा लेते हैं। न दिन और न रात में वे लैम्प जलाते हैं। इसका कारण यह है कि कुछ छोटी-छोटी मक्खियां उसकी लौ में जलकर भस्म हो जाएंगी। यदि रात को रोशनी की जरूरत आ ही पड़े तो उनके पास वार्निश किए गए कागज या कपड़े की लालटेन होती है, ताकि कोई जीवित प्राणी उसमें घुसकर लौ का ग्रास न बन जाए। यदि इन लोगों के सिर में जूं पैदा हो जाएं तो वे उन्हें मारते नहीं, लेकिन यदि वे उन्हें बहुत ज्यादा सताने लगें तो वे खास आदमियों को बुला लेते हैं। वे भी मूर्तिपूजक होते हैं। वे भी उन्हीं के बीच रहते हैं और उन्हें वे पुण्यात्मा लोग मानते हैं। वे बड़े जती, सती और तपस्वी जैसे होते हैं। अपने देवताओं के प्रति उनकी गहरी भक्ति होती है। ये लोग उनके सिरों से जुएं बीनते हैं। जितनी जुएं वे बीनते हैं, उन्हें वे अपने सिर में डालते जाते हैं और उन्हें वे अपने रक्त पर पनपने देते हैं। उनकी धारणा है कि इस प्रकार वे अपने ‘आराध्य देव’ की महती सेवा करते हैं। इस प्रकार वे सबके सब बड़े आत्म-संयम के साथ अपने अहिंसा के नियम का पालन करते हैं। दूसरी ओर वे पक्के सूदखोर होते हैं। वे मापतोल तथा अन्य अनेक प्रकार के माल व सिक्कों में भारी हेराफेरी करते हैं। वे परले-सिरे के झूठे होते हैं। गेहुंए वर्ण के ये मूर्तिपूजक लंबे और देखने में सुंदर और मृदु होते हैं। वे चटख रंग के वस्त्र पहनते हैं। उनका भोजन सात्विक एवं स्वादिष्ट होता है। उनका प्रिय भोजन है - दूध, मक्खन-शक्कर, भात और विविध प्रकार के अनेक मुरब्बे। उनके खाने में फल-साग और सब्जी की भरमार रहती है। जहां-जहां वे रहते हैं, वहां-वहां उनके फलों के उद्यान, बगीचे और तालाब होते हैं। इन तालाबों में स्त्री-पुरुष दिन में दो बार स्नान करते हैं। उनका कहना कि जब स्नान कर लेते हैं तो उस समय तक के उनके सारे पाप धुल जाते हैं। हमारी स्त्रियों की भांति ये बनिए लंबे-लंबे केश रखते हैं। वे उन्हें लपेट