वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
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कर सिर पर गांठ की शक्ल दे देते हैं, और उसके ऊपर पगड़ी पहनते हैं। इस प्रकार उनके केश सदा जूड़े के रूप में रहते हैं। अपने केशों में वे फूल तथा सुगंधित इत्र आदि लगाते हैं।
सफेद चंदन के साथ केसर तथा अन्य सुगंधित द्रव्यों को मिलाकर वे उसका लेप अपने शरीर पर करते हैं। वे बड़े श्रृंगार प्रिय लोग होते हैं। वे सूती अथवा रेशमी लंबे कुर्ते और लंबी नोक वाले कामदार जूते पहनते हैं उनमें से कुछ रेशम और जरी के छोटे कोट पहनते हैं। वे हथियार नहीं रखते। हथियार के नाम पर उनके पास केवल सोने और चांदी के काम वाले नन्हे चाकू होते हैं। इसके दो कारण होते हैं। एक तो यह कि उनका हथियारों से बहुत कम वास्ता पड़ता है। दूसरा यह कि उनकी रक्षा तो मूर करते हैं।
ब्राह्मण ! मूर्तिपूजकों की एक और जाति भी है, जिसे लोग ब्राह्मण कहते हैं। वे पुजारी होते हैं। मंदिरों पर इन्हीं का कब्जा होता है। पूजा-घर इन्हीं के नियंत्रण में होते हैं। वे मंदिर बड़े-बड़े होते हैं। इनमें भरपूर आमदनी होती है। उनमें से अनेक मंदिर दान-दक्षिणा पर चलते हैं। इन मंदिरों में लकड़ी, पत्थर और तांबे की अनेक मूर्तियां होती हैं। इन मंदिरों में वे अपने आराध्य देवों के सम्मान में बड़े-बड़े समारोह करते हैं और हमारी ही तरह उनकी पूर्जा-अर्चना में ढेर सारी मोमबत्तियां, दिए जलाते हैं और घंटे-घडि़याल बजाते हैं। इन ब्राह्मणों और मूर्तिपूजको का जो धर्म है, वह होली ट्रिनिटी (यानी पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के त्रय की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति) से बहुत कुछ मिलता-जुलता है। वे होली ट्रिनिटी (तीन देवों का) परम सम्मान करते हैं। वे सदैव तीन देवों में परम देव की पूजा करते हैं, जो उनकी दृष्टि में सच्चा ईश्वर है, समूची सृष्टि का सिरजनहार है। उनके अनुसार अन्य अनेक देवता है, जो होली ट्रिनिटी के अधीन हैं। जहां कहीं भी इन ब्राह्मणों तथा मूर्तिपूजकों को हमारे चर्च मिलते हैं, वहां वे जाते हैं और हमारी मूर्तियों की पूजा-अर्चना करते हैं। से सदा ही सांता मारिया की चर्चा करते हैं। वैसे उन्हें इस बारे में कुछ पूरी जानकारी है। हमारी ही रीति से वे चर्च का सम्मान करते हैं और कहते हैं कि हमारे और आपके बीच तो नाममात्र का अंतर है। वे किसी भी मारी गई वस्तु को नहीं खाते, न ही वे किसी की हत्या करते हैं। स्नान का उनके लिए बड़ा महात्म्य है। उनका कहना है कि स्नान से तो वे तर जाते हैं।
कालीकट के इसी राज्य में ब्राह्मण नामक एक जाति भी है। उनमें हमारे पादरियों की भांति पुजारी होते हैं। उनकी चर्चा मैं अन्यत्र कर चुका हूं।
वे सब एक ही भाषा बोलते हैं और केवल ब्राह्मण का बेटा ही ब्राह्मण हो